भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

भी चिन्ता नहीं होती। कारण कि यह साधन क्रियाजन्य | जागृति है। अतः इसमें कठिनताका नामोनिशान नहीं है। अथवा अभ्यासजन्य नहीं है। इसमें तो वास्तविक सम्बन्धकी | इसीसे भगवान्ने अपने-आपको सुलभ बताया है।

परिशिष्ट भाव—‘अनन्यचेताः’ —भक्तकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय अन्यकी सत्ता न होनेसे उसका मन अन्य जगह कैसे जायगा? क्यों जायगा? कहाँ जायगा? इसलिये वह स्वतः अनन्यचित्त्वाला हो जाता है।

‘सततं यो मां स्मरति नित्यशः’ —एक ‘करना’ होता है और एक ‘होना’ होता है। जो करते हैं, वह क्रिया है और जो अपने-आप होता है, वह स्मरण है। जैसे, गीताके अन्तमें अर्जुनने कहा—‘स्मृतिर्लब्धा’ (१८।७३) तो वह स्मृति क्रिया नहीं है, प्रत्युत भगवान्के साथ अपने नित्य सम्बन्धकी स्वतः होनेवाली स्मृति है। भगवान्के स्मरणमें खास हेतु उनमें अपनापन है। भगवान् ही मेरे हैं और मेरे लिये हैं—इस प्रकार भगवान्में अपनापन होनेसे स्वतः भगवान्में प्रेम होता है और जिसमें प्रेम होता है, उसका स्मरण अपने-आप और नित्य-निरन्तर होता है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ‘मध्यासक्तमनाः’ पदसे अपनेमें आसक्ति अर्थात् प्रेम होनेकी बात कही है। तात्पर्य है कि केवल भगवान्को ही अपना और अपने लिये माननेसे साधककी भगवान्में प्रियता हो जाती है। भगवान्में प्रियता होनेके बाद फिर भगवान्का स्मरण स्वतः होता है।

‘नित्ययुक्तस्य’ —नित्य-निरन्तर भगवान्के साथ जुड़ा हुआ होनेसे भक्तको ‘नित्ययुक्त’ कहा गया है। सातवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः’ पदोंसे भी यही बात कही गयी है। ‘नित्ययुक्तस्य’ पदसे श्लोकके पूर्वाधर्ममें आयी सभी बातोंका समाहार हो जाता है।

‘तस्याहं सुलभः पार्थ’ —भगवान्ने महात्माको तो दुर्लभ बताया है—‘स महात्मा सुदुर्लभः’ (गीता ७।१९), पर यहाँ अपनेको सुलभ बताया है। इसका तात्पर्य है कि संसारमें भगवान् दुर्लभ नहीं हैं, प्रत्युत उनके तत्त्वको जानकर उनके शरण होनेवाले भक्त दुर्लभ हैं। कारण कि भगवान्को दृढ़े तो वे सब जगह मिल जायेंगे, पर भगवान्का प्यारा भक्त कहीं-कहीं ही मिलेगा—

हरि दुरलभ नहि जगतमें, हरिजन दुरलभ होय। हरि हेर्याँ सब जग मिलै, हरिजन कहि एक होय॥

भगवान् कृपा करके जो मनुष्यशरीर देते हैं, उस शरीरसे जीव अनेक योनियोंमें तथा नरकोंमें भी जा सकता है। परन्तु भक्त कृपा करके भगवान्की ही प्राप्ति करता है—

हरि से तू जनि हेत कर, कर हरिजन से हेत। हरि रीझै जग देत हैं, हरिजन हरि ही देत॥

वास्तवमें जो नित्यप्राप्त है, उसमें सुलभता-दुर्लभता कहना बनता ही नहीं। परन्तु लोगोंने उसको दुर्लभ (कठिन) मान रखा है, इस वृत्तिको हटानेके लिये भगवान्ने अपनेको सुलभ बताया है। जिसकी खुदकी सत्ता है ही नहीं, उस असत् (शरीर-संसार) को सत्ता और महत्ता देनेसे तथा उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्यप्राप्त परमात्मा दुर्लभ हो रहे हैं। असत्को सत्ता और महत्ता न दें तो परमात्माकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है। असत् है और वह अपना तथा अपने लिये है—ऐसा मानना ही असत्को सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना है।

सम्बन्ध—अब दो श्लोकोंमें भगवान् अपनी प्राप्तिका माहात्म्य बताते हैं।

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।

नाजुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥

महात्मानः= महात्मालोगदुःखोंके घरवाले
माम्= मुझे(और)पुनर्जन्म = पुनर्जन्मको
उपेत्य= प्राप्त करकेअशाश्वतम् = अशाश्वत अर्थात्न, आजुवन्ति = प्राप्त नहीं होते;
दुःखालयम्= दुःखालय अर्थात्निरन्तर बदलने-(क्योंकि वे)