श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 612, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २२]
- साधक-संजीवनी *
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| तम् | = उसीको | परमा् | = परम | न, निवर्तन्ते | = फिर लौटकर |
|---|---|---|---|---|---|
| अव्यक्तः | = अव्यक्त (और) | गतिम् | = गति | (संसारमें) नहीं आते, | |
| अक्षरः | = अक्षर— | आहुः | = कहा गया है (और) | तत् | = वह |
| इति | = ऐसा | यम् | = जिसको | मम | = मेरा |
| उक्तः | = कहा गया है (तथा | ||||
| उसीको) | प्राप्य | = प्राप्त होनेपर | |||
| (जीव) | परमम् | = परम | |||
| धाम | = धाम है। |
व्याख्या —‘अव्यक्तोऽक्षर’”तद्भाम परमं मम’—भगवान्ने सातवें अध्यायके अठ्ठाईसवें, उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें जिसको ‘माम्’, कहा है तथा आठवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें ‘अक्षरं ब्रह्म’, चौथे श्लोकमें ‘अधियज्ञः’, पाँचवें और सातवें श्लोकमें ‘माम्’, आठवें श्लोकमें ‘परमं पुरुषं दिव्यम्’, नवें श्लोकमें ‘कविं पुराणमनुशासितारम्’ आदि, तेरहवें, चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें ‘माम्’, बीसवें श्लोकमें ‘अव्यक्तः’ और ‘सनातनः’ कहा है, उन सबकी एकता करते हुए भगवान् कहते हैं कि उसीको अव्यक्त और अक्षर कहते हैं तथा उसीको परमगति अर्थात् सर्वश्रेष्ठ गति कहते हैं; और जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है अर्थात् मेरा सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है। इस प्रकार जिस प्रापणीय वस्तुको अनेक रूपोंमें कहा गया है, उसकी यहाँ एकता की गयी है। ऐसे ही चौदहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें भी ‘ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकात्मिक सुखका आश्रय मैं हूँ’ ऐसा कहकर भगवान्ने प्रापणीय वस्तुकी एकता की है।
लोगोंकी ऐसी धारणा रहती है कि सगुण-उपासनाका फल दूसरा है और निर्गुण-उपासनाका फल दूसरा है। इस धारणाको दूर करनेके लिये इस श्लोकमें सबकी एकताका
परिशिष्ट भाव —अव्यक्त, अक्षर आदि नामोंकी पहुँच उस प्रापणीय तत्त्वतक नहीं है। कारण कि वह अव्यक्त-व्यक्त, अक्षर-क्षर, गति-स्थिति दोनोंसे रहित निरपेक्ष तत्त्व है। उसको प्राप्त होनेपर जीव लौटकर नहीं आता; क्योंकि उसकी अवधि नहीं है।
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥
पार्थ | = हे पृथानन्दन अर्जुन! | येन | = जिससे | परः | = परम ---|---|---|---|---|--- भूतानि | = सम्पूर्ण प्राणी | इदम् | = यह | पुरुषः | = पुरुष परमात्मा यस्य | = जिसके | सर्वम् | = सम्पूर्ण संसार | तु | = तो अन्तःस्थानि | = अन्तर्गत हैं (और) | ततम् | = व्याप्त है, | अनन्यया, भक्त्या | = अनन्य भक्तिसे | | सः | = वह | लभ्यः | = प्राप्त होनेयोग्य है।