भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 614, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 614

श्लोक २३ ]

  • साधक-संजीवनी *

६१३

फिर साधककी न तो अन्य स्वरूपोंकी तरफ वृत्ति जाती है और न उनकी आवश्यकता ही रहती है। उसकी वृत्ति केवल मेरे स्वरूपकी तरफ ही रहती है।

इस प्रकार ब्रह्माजीके लोकसे मेरा लोक विलक्षण है,

ब्रह्माजीके स्वरूपसे मेरा स्वरूप विलक्षण है और ब्रह्मलोककी गतिसे मेरे लोक-(धाम-) की गति विलक्षण है। तात्पर्य है कि सब प्राणियोंका अन्तिम ध्येय मैं ही हूँ और सब मेरे ही अन्तर्गत हैं।

परिशिष्ट भाव —भक्तिको ‘अनन्य’ कहनेका तात्पर्य है कि भक्तिके साथ थोड़ा भी जड़ताका अंश, अहम्का संस्कार, अपने मतका संस्कार न रहे अर्थात् किसी भी तरफ किंचिन्मात्र भी खिंचाव न रहे। सब कुछ भगवान् ही हैं—ऐसा अनुभव करना अनन्यभक्ति है।

सुखकी वासना तो एक ही है, पर सुख-सामग्रीकी तारतम्यता अनेक लोकोंमें है। ब्रह्मलोकतकका सुख भी आकृष्ट न करे, यहाँतक कि अपनी स्वाधीनता-(मुक्ति-) का सुख भी सन्तुष्ट न कर सके, तब भक्ति प्राप्त होती है।

सातवें अध्यायमें भगवान्ने कहा था—‘मत्तः परतरं नात्यक्तिकिचिदस्ति ’ (७।७), उसी बातको यहाँ ‘यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ’ पदोंसे कहा है। इसीको आगे नवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें विस्तारसे कहेंगे। इन सबका तात्पर्य है कि एक भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं।

सम्बन्ध—सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि ब्रह्मलोकतकको प्राप्त होनेवाले लौटकर आते हैं और मेरेको प्राप्त होनेवाले लौटकर नहीं आते। परंतु किस मार्गसे जानेवाले लौटकर नहीं आते और किस मार्गसे जानेवाले लौटकर आते हैं? यह बताना बाकी रह गया। अतः उन दोनों मार्गोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उपक्रम करते हैं।

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।

प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥

तु= परन्तुयोगिनः= योगीहोते हैं अर्थात् पीछे
भरतर्षभ= हे भरतवंशियोंमेंअनावृत्तिम्= अनावृतिकोलौटकर आते हैं,
श्रेष्ठ अर्जुन!यान्ति= प्राप्त होते हैं अर्थात्तम् = उस
यत्र= जिसपीछे लौटकर
काले= काल अर्थात्नहीं आतेकालम् = कालको अर्थात्
मार्गमेंच, एव= और (जिस मार्गमेंदोनों मार्गोंको
प्रयाता= शरीर छोड़करगये हुए)
गये हुएआवृत्तिम्= आवृतिको प्राप्तवक्ष्यामि = मैं कहूँगा।

व्याख्या —[जीवित अवस्थामें ही बन्धनसे छूटनेको ‘सद्योमुक्ति’ कहते हैं अर्थात् जिनको यहाँ ही भगवत्प्राप्ति हो गयी, भगवान्में अनन्यभक्ति हो गयी, अनन्यप्रेम हो गया, वे यहाँ ही परम संसिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं। दूसरे जो साधक किसी सूक्ष्म वासनाके कारण ब्रह्मलोकमें जाकर क्रमशः ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं, उनकी मुक्तिको ‘क्रममुक्ति’ कहते हैं। जो केवल सुख भोगनेके लिये ब्रह्मलोक आदि लोकोंमें जाते हैं, वे फिर लौटकर आते हैं। इसको ‘पुनरावृत्ति’ कहते हैं। सद्योमुक्तिका वर्णन तो पंद्रहवें श्लोकमें हो गया, पर क्रममुक्ति और पुनरावृत्तिका वर्णन करना बाकी रह गया। अतः इन दोनोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।]

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं ..... वक्ष्यामि भरतर्षभ ’—पीछे छूटे हुए विषयका लक्ष्य करनेके लिये यहाँ ‘तु’ अव्ययका प्रयोग किया गया है।

ऊर्ध्वगतिवालोंको कालाभिमानी देवता जिस मार्गसे ले जाता है, उस मार्गका वाचक यहाँ ‘काल’ शब्द लेना चाहिये; क्योंकि आगे छब्बीसवें और सत्ताईसवें श्लोकमें इसी ‘काल’ शब्दको मार्गके पर्यायवाची ‘गति’ और ‘सृति’ शब्दोंसे कहा गया है।

अनावृत्तिमावृत्तिम् ’ कहनेका तात्पर्य है कि अनावृत ज्ञानवाले पुरुष ही अनावृत्तिमें जाते हैं और आवृत ज्ञानवाले पुरुष ही आवृत्तिमें जाते हैं। जो सांसारिक पदार्थों और भोगोंसे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख हो गये हैं, वे