श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 622, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
६२१
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'अक्षरब्रह्मयोग' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥८॥
'अक्षर' और 'ब्रह्म' शब्द परमात्माके निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकार और सगुण-साकार—इन तीनों स्वरूपोंके वाचक हैं। इन तीनोंमेंसे किसी भी स्वरूपका चिन्तन करनेसे परमात्माके साथ योग (सम्बन्ध) हो जाता है। अतः इस अध्यायका नाम 'अक्षरब्रह्मयोग' रखा गया है।
आठवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें 'अथाष्टमोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके चार, श्लोकोंके तीन सौ सतहत और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग तीन सौ सत्तानबे है।
(२) 'अथाष्टमोऽध्यायः' के छः, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके तेरह, श्लोकोंके नौ सौ पैतालीस और पुष्पिकाके सैंतालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार ग्यारह है। इस अध्यायके अट्ठाईस श्लोकोंमेंसे नवों, ग्यारहवों और अट्ठाईसवों—ये तीन श्लोक चौवालीस अक्षरोंके तथा दसवों श्लोक पैतालीस अक्षरोंका
है। शेष चौबीस श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें दो उवाच हैं—'अर्जुन उवाच' और 'श्रीभगवानुवाच'।
आठवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके अट्ठाईस श्लोकोंमेंसे नवों, दसवों और ग्यारहवों—ये तीन श्लोक 'उपजाति' छन्दवाले हैं और अट्ठाईसवों श्लोक 'इन्द्रवज्रा' छन्दवाला है। बचे हुए चौबीस श्लोकोंमेंसे—दूसरे श्लोकके तृतीय चरणमें और चौदहवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; चौबीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; सत्ताईसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे 'र-विपुला' तथा तीसरे श्लोकके प्रथम और तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'जातिपक्ष-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उन्नीस श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।