भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 624

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ नवमोऽध्यायः

अवतरणिका-

सातवें अध्यायमें भगवान्‌के द्वारा विज्ञानसहित ज्ञान कहनेका जो प्रवाह चल रहा था, उसके बीचमें ही अर्जुनने

आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न कर लिये। उनमेंसे छः प्रश्नोंका उत्तर भगवान्‌ने संक्षेपसे देकर अन्तकालीन

गतिविषयक सातवें प्रश्नका उत्तर विस्तारसे दिया।

अब सातवें अध्यायमें कहनेसे बचे हुए उसी विज्ञानसहित ज्ञानके विषयको विलक्षण रीतिसे कहनेके लिये भगवान्

नवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं।

श्रीभगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले-

इदम्

= यह

ते

= तेरे लिये

ज्ञात्वा

= जानकर (तू)

गुह्यतमम्

= अत्यन्त गोपनीय

तु

= तो (मैं फिर)

अशुभात्

= अशुभसे अर्थात्

विज्ञानसहितम् = विज्ञानसहित

प्रवक्ष्यामि

= अच्छी तरहसे

जन्म-मरणरूप

ज्ञानम्

= ज्ञान

कहूँगा,

संसारसे

अनसूयवे

= दोषदृष्टिरहित

यत्

= जिसको

मोक्ष्यसे

= मुक्त हो जायगा।

व्याख्या-'इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे'-

भगवान्‌के मनमें जिस तत्त्वको, विषयको कहनेकी इच्छा

है, उसकी तरफ लक्ष्य करानेके लिये ही यहाँ भगवान्

सबसे पहले 'इदम्' (यह) शब्दका प्रयोग करते हैं। उस

(भगवान्‌के मन-बुद्धिमें स्थित) तत्त्वकी महिमा कहनेके

लिये ही उसको 'गुह्यतमम्' कहा है अर्थात् वह तत्त्व

अत्यन्त गोपनीय है। इसीको आगेके श्लोकमें 'राजगुह्यम्'

और अठारहवें अध्यायके चौंसठवें श्लोकमें 'सर्वगुह्यतमम्'

कहा है।

यहाँ पहले 'गुह्यतमम्' कहकर पीछे (गीता ९। ३४

में) 'मन्मना भव' कहा है और अठारहवें अध्यायमें

पहले 'सर्वगुह्यतमम्' कहकर पीछे (गीता १८। ६५ में)

'मन्मना भव' कहा है। तात्पर्य है कि यहाँका और

वहाँका विषय एक ही है, दो नहीं।

यह अत्यन्त गोपनीय तत्त्व हरेकके सामने नहीं कहा

जा सकता; क्योंकि इसमें भगवान्‌ने खुद अपनी महिमाका

वर्णन किया है। जिसके अन्तःकरणमें भगवान्‌के प्रति थोड़ी

भी दोषदृष्टि है, उसको ऐसी गोपनीय बात कही जाय,

तो वह 'भगवान् आत्मश्लाघी हैं-अपनी प्रशंसा करनेवाले

हैं' ऐसा उलटा अर्थ ले सकता है। इसी बातको लेकर

भगवान् अर्जुनके लिये 'अनसूयवे' विशेषण देकर कहते

हैं कि भैया ! तू दोष-दृष्टिरहित है, इसलिये मैं तेरे सामने

अत्यन्त गोपनीय बातको फिर अच्छी तरहसे कहूँगा अर्थात्

उस तत्त्वको भी कहूँगा और उसके उपायोंको भी

कहूँगा-'प्रवक्ष्यामि'।

'प्रवक्ष्यामि' पदका दूसरा भाव है कि मैं उस बातको

विलक्षण रीतिसे और साफ-साफ कहूँगा अर्थात् मात्र मनुष्य

मेरे शरण होनेके अधिकारी हैं। चाहे कोई दुराचारी-से-

दुराचारी, पापी-से-पापी क्यों न हो तथा किसी वर्णका,

किसी आश्रमका, किसी सम्प्रदायका, किसी देशका, किसी