श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 626, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव-संसार 'प्रकट' है। कर्मयोग (निष्कामभाव) प्रकट न होनेसे 'गुह्य' है। उससे भी गुप्त होनेसे
ज्ञानयोग (आत्मज्ञान) 'गुह्यतर' है। ज्ञानयोगसे भी गुप्त होनेसे भक्तियोग (परमात्मज्ञान) 'गुह्यतम' है। गुह्य और गुह्यतर
तो लौकिक हैं, पर गुह्यतम अलौकिक है।
ब्रह्मलोकतकके सभी लोक पुनरावर्ती होनेसे 'अशुभ' हैं (गीता-आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। गुह्यतम
विषयको जान लेनेसे मनुष्य अशुभसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। अशुभसे मुक्ति तो कर्मयोग और ज्ञानयोगसे भी हो
जाती है, पर यहाँ अशुभसे मुक्ति होनेका तात्पर्य है-एक परमात्माके सिवाय अन्यकी किंचिन्मात्र भी सत्ता न रहे,
अहम्की वह सूक्ष्म गन्ध भी न रहे, जिससे दार्शनिक मतभेद पैदा होते हैं।
अपने स्वरूपको जानना 'ज्ञान' है और समग्र भगवान्को जानना 'विज्ञान' है। निर्गुणके अन्तर्गत तो सगुण (समग्र)
नहीं आ सकता, पर सगुणके अन्तर्गत निर्गुण भी आ जाता है, इसलिये सगुणका ज्ञान 'विज्ञान' अर्थात् विशेष ज्ञान है।
सम्बन्ध-पूर्वश्लोकमें विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके उसका परिणाम अशुभसे मुक्त होना बताया। अब
आगेके श्लोकमें उसी विज्ञानसहित ज्ञानकी महिमाका वर्णन करते हैं।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥ २॥
इदम्
= यह (विज्ञानसहित
पवित्रम्
= यह अति
धर्म्यम्
= यह धर्ममय है,
ज्ञान अर्थात्
पवित्र
अव्ययम्
= अविनाशी है (और)
समग्ररूप)
(तथा)
कर्तुम्
= करनेमें
राजविद्या
= सम्पूर्ण विद्याओंका
उत्तमम्
= अतिश्रेष्ठ है
सुसुखम्
= बहुत सुगम है
राजा (और)
(और)
अर्थात् इसको प्राप्त
राजगुह्यम्
= सम्पूर्ण गोपनीयोंका
प्रत्यक्षावगमम् = इसका फल भी
करना बहुत सुगम
राजा है।
प्रत्यक्ष है।
है।
व्याख्या-'राजविद्या'-यह विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्ण
विशेष गोपनीय बात है; क्योंकि वह नाटकमें जिस स्वाँगमें
विद्याओंका राजा है; क्योंकि इसको ठीक तरहसे जान
खेलता है, उसमें वह अपने असली रूपको छिपाये रखता
लेनेके बाद कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता।
है। ऐसे ही भगवान् जब मनुष्यरूपमें लीला करते हैं, तब
भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें कहा है कि 'मेरे
अभक्त लोग उनको मनुष्य मानकर उनकी अवज्ञा करते
समग्ररूपको जाननेके बाद जानना कुछ बाकी नहीं रहता।'
हैं। इससे भगवान् उनके सामने अपने-आपको प्रकट नहीं
पन्द्रहवें अध्यायके अन्तमें कहा है कि 'जो असम्मूढ़ पुरुष
करते (गीता-सातवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)। परन्तु
मेरेको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम जानता है, वह
जो भगवान्के ऐकान्तिक प्यारे भक्त होते हैं, उनके सामने
सर्ववित् हो जाता है अर्थात् उसको जानना कुछ बाकी नहीं
भगवान् अपने-आपको प्रकट कर देते हैं-यह अपने-
रहता', इससे ऐसा मालूम होता है कि भगवान्के सगुण-
आपको प्रकट कर देना ही अत्यन्त गोपनीय बात है।
निर्गुण, साकार-निराकार, व्यक्त-अव्यक्त आदि जितने
'पवित्रमिदम्'-इस विद्याके समान पवित्र करनेवाली
स्वरूप हैं, उन सब स्वरूपोंमें भगवान्के सगुण-साकार
दूसरी कोई विद्या है ही नहीं अर्थात् यह विद्या पवित्रताकी
स्वरूपकी बहुत विशेष महिमा है।
आखिरी हद है। पापी-से-पापी, दुराचारी-से-दुराचारी भी
'राजगुह्यम्'-संसारमें रहस्यकी जितनी गुप्त बातें हैं,
इस विद्यासे बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है अर्थात् पवित्र
उन सब बातोंका यह राजा है; क्योंकि संसारमें इससे बड़ी
बन जाता है और शाश्वती शान्तिको प्राप्त कर लेता है (नवें
दूसरी कोई रहस्यकी बात है ही नहीं।
अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।
जैसे नाटकमें सबके सामने खेलता हुआ कोई पात्र
दसवें अध्यायमें अर्जुनने भगवान्को परम पवित्र
अपना असली परिचय दे देता है, तो उसका परिचय देना
बताया-'पवित्रं परमं भवान्' (१०। १२); चौथे