भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक ३]

  • साधक-संजीवनी *

६२७

'सुसुखं कर्तुम्'—यह करनेमें बहुत सुगम है; क्योंकि यह स्वतः प्राप्त है। सब कुछ परमात्मा ही हैं—इसमें कोई परिश्रम नहीं है, यह तो केवल स्वीकृति है। कर्मयोगकी दृष्टिसे जो वस्तु अपनी नहीं है, प्रत्युत दूसरोंकी है, उसको दूसरोंकी सेवामें लगानेमें क्या जोर आता है! ज्ञानयोगकी दृष्टिसे अपने-आपमें स्थित होनेमें क्या जोर आता है! भक्तियोगकी दृष्टिसे जो अपना है, उसकी तरफ जानेमें क्या जोर आता है! ये सब काम सुखपूर्वक होते हैं।

'अव्ययम्'—वास्तवमें अविनाशी और अन्तिम तत्त्व यही है इससे आगे कुछ नहीं है।

सम्बन्ध—ऐसी सुगम और सर्वोपरि विद्याके होनेपर भी लोग उससे लाभ क्यों नहीं उठा रहे हैं? इसपर कहते हैं—

अश्रद्धधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।

अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ ३ ॥

परन्तप= हे परन्तप!पुरुषाः= मनुष्यवर्त्मनिसंसारके मार्गमें
अस्य= इसमाम्= मुझेनिवर्तन्ते= लौटते रहते हैं
धर्मस्य= धर्मकी महिमापरअप्राप्य= प्राप्त न होकरअर्थात् बार-बार
अश्रद्धधानाः= श्रद्धा न रखनेवालेमृत्युसंसार-= मृत्युरूपजन्मते-मरते रहते हैं।

व्याख्या— 'अश्रद्धधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य* परन्तप'—धर्म दो तरहका होता है—स्वधर्म और परधर्म। मनुष्यका जो अपना स्वतःसिद्ध स्वरूप है, वह उसके लिये स्वधर्म है और प्रकृति तथा प्रकृतिका कार्यमात्र उसके लिये परधर्म है—'संसारधर्मरविमुद्गमानः ' (श्रीमद्भगवद्गीता ११।२।४९)। पीछेके दो श्लोकोंमें भगवान्ने जिस विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेकी प्रतिज्ञा की और राजविद्या आदि आठ विशेषण देकर जिसका बड़ा माहात्म्य बताया, उसीको यहाँ 'धर्म' कहा गया है। इस धर्मके माहात्म्यपर श्रद्धा न रखनेवाले अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंको सच्चा मानकर उन्हींमें रचे-पचे रहनेवाले मनुष्योंको यहाँ 'अश्रद्धधानाः ' कहा गया है।

यह एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि मनुष्य अपने शरीरको, कुटुम्बको, धन-सम्पत्ति-वैभवको निःसन्देह-रूपसे उत्पत्ति-विनाशशील और प्रतिक्षण परिवर्तनशील जानते हुए भी उनपर विश्वास करते हैं, श्रद्धा करते हैं, उनका आश्रय लेते हैं। वे ऐसा विचार नहीं करते कि इन शरीरादिके साथ हम कितने दिन रहेंगे और ये हमारे साथ कितने दिन रहेंगे? श्रद्धा तो स्वधर्मपर होनी चाहिये थी, पर वह हो गयी परधर्मपर!

'अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि'— परधर्मपर श्रद्धा रखनेवालोंके लिये भगवान् कहते हैं कि सब देशमें,

सब कालमें, सम्पूर्ण वस्तुओंमें, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें सदा-सर्वदा विद्यमान, सबको नित्यप्राप्त मुझे प्राप्त न करके मनुष्य मृत्युरूप संसारके रास्तेमें लौटते रहते हैं। कहीं जन्म गये तो मरना बाकी रहता है और मर गये तो जन्मना बाकी रहता है। ये जिन योनियोंमें जाते हैं, उन्हीं योनियोंमें ये अपनी स्थिति मान लेते हैं अर्थात् 'मैं शरीर हूँ' ऐसी अहंता और 'शरीर मेरा है' ऐसी ममता कर लेते हैं। परन्तु वास्तवमें उन योनियोंसे भी उनका निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद होता रहता है। किसी भी योनिके साथ इनका सम्बन्ध टिक नहीं सकता। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिसे भी इनका निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है अर्थात् वहाँसे भी ये हरदम निवृत्त हो रहे हैं, लौट रहे हैं। ये किसीके साथ हरदम रह ही नहीं सकते। ऐसे ही ये ऊर्ध्वगतिमें अर्थात् ऊँची-से-ऊँची भोग-भूमियोंमें भी चले जायें तो वहाँसे भी इनको लौटना ही पड़ेगा (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ तथा पचीसवाँ और नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि मेरेको प्राप्त हुए बिना ये मनुष्य जहाँ-कहीं भी जायेंगे, वहाँसे इनको लौटना ही पड़ेगा, बार-बार जन्मना और मरना ही पड़ेगा।

'मृत्युसंसारवर्त्मनि' कहनेका मतलब है कि इस संसारके रास्तेमें मरना-ही-मरना है, विनाश-ही-विनाश है,

  • यहाँ 'अश्रद्धधानाः' पदमें आये हुए 'शान्च कृत' प्रत्ययके योगमें 'न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्तृनाम्' (पाणि० अष्टा० २।३।६९)—इस सूत्रके नियमसे द्वितीया विभक्ति होनी चाहिये; परन्तु यह सूत्र कारक-षष्ठीका ही निषेध करता है। अतः यहाँ शेष षष्ठीसे 'धर्म' पदमें षष्ठी विभक्ति की गयी है।