भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

अपराको पकड़नेसे ही मनुष्य मौतके रास्तेमें चला जाता है। अगर वह अपराको न पकड़े, प्रत्युत जिसकी अपरा है, उस भगवान्को पकड़े तो सदाके लिये जन्म-मरणसे मुक्त हो जाय! मनुष्य इसी जन्ममें मुक्त हो सकता है और मुक्तिसे भी बढ़कर भगवान्का प्रेम (भक्ति) प्राप्त कर सकता है। परन्तु भगवान्से इतनी बड़ी योग्यता, पात्रता, अधिकारिता पाकर भी वह मौतके रास्तेमें चल पड़ा! इसलिये भगवान् दुःखके साथ कहते हैं—‘अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युंसंसारवर्त्तनिं’! और ‘मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्यधर्मा गतिम्’ (गीता १६।२०)। इससे सिद्ध होता है कि अभी कल्याणप्राप्तिका बड़ा सुन्दर मौका है। मनुष्य खुद अपने कल्याणमें लग जाय तो इसमें धर्म, ग्रन्थ, महात्मा, संसार, भगवान् सब सहायता करते हैं!

सम्बन्ध—इस अध्यायके पहले और दूसरे श्लोकमें जिस राजविद्याकी महिमा कही गयी है, अब आगेके दो श्लोकोंमें उसीका वर्णन करते हैं।

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥ न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभून् च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥

इदम्= यहतेषु= उनमेंभूतभावनः= सम्पूर्ण प्राणियोंको
सर्वम्= सबन, अवस्थितः= स्थित नहीं हूँउत्पन्न
जगत्= संसार= तथाकरनेवाला
मया= मेरेभूतानि= (वे) प्राणी (भी)= और
अव्यक्तमूर्तिना= निराकारमत्स्थानि= मुझमें स्थितभूतभूत्= प्राणियोंका धारण,
स्वरूपसे= नहीं हैं—भरण-पोषण
तत्म्= व्याप्त है।मे= मेरे (इस)करनेवाला
सर्वभूतानि= सम्पूर्णऐश्वरम्= ईश्वर-मम= मेरा
प्राणीसम्बन्धीआत्मा= स्वरूप
मत्स्थानि= मुझमें स्थित हैं;योगम्= योग-भूतस्थः= उन प्राणियोंमें
= परन्तु(सामर्थ्य-) कोस्थित
अहम्= मैंपश्य= देख।= नहीं है।

व्याख्या—‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’—मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसे जिसका ज्ञान होता है, वह भगवान्का व्यक्तरूप है और जो मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय नहीं है अर्थात् मन आदि जिसको नहीं जान सकते, वह भगवान्का अव्यक्तरूप है। यहाँ भगवान्ने ‘मया’ पदसे व्यक्त- (साकार-) स्वरूप और ‘अव्यक्तमूर्तिना’ पदसे अव्यक्त- (निराकार-) स्वरूप बताया है। इसका तात्पर्य है कि भगवान् व्यक्तरूपसे भी हैं और अव्यक्तरूपसे भी हैं। इस प्रकार भगवान्की यहाँ व्यक्त-अव्यक्त (साकार-निराकार) कहनेकी गूढ़ाभिपत्ति समग्ररूपसे है अर्थात् सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदिका भेद तो सम्प्रदायोंको

लेकर है, वास्तवमें परमात्मा एक हैं। ये सगुण-निर्गुण आदि एक ही परमात्माके अलग-अलग विशेषण हैं, अलग-अलग नाम हैं।

गीतामें जहाँ सत्-असत्, शरीर-शरीरीका वर्णन किया गया है, वहाँ जीवके वास्तविक स्वरूपके लिये आया है—‘येन सर्वमिदं तत्म्’ (२।१७); क्योंकि यह परमात्माका साक्षात् अंश होनेसे परमात्माके समान ही सर्वत्र व्यापक है अर्थात् परमात्माके साथ इसका अभेद है। जहाँ सगुण-निराकारकी उपासनाका वर्णन आया है, वहाँ बताया है—‘येन सर्वमिदं तत्म्’ (८।२२), जहाँ कर्मके द्वारा भगवान्का पूजन बताया है, वहाँ भी कहा है—