श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 634, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४-५]
- साधक-संजीवनी *
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उसको भगवान्की ही लीला देखनी चाहिये। भगवान् ही कभी उत्पत्तिकी लीला, कभी स्थितिकी लीला और कभी संहारकी लीला करते हैं। यह सब संसार स्वरूपसे तो भगवान्का ही रूप है और इसमें जो परिवर्तन होता है, वह सब भगवान्की ही लीला है—इस तरह भगवान् और उनकी लीलाको देखते हुए भक्तको हरदम प्रसन्न रहना चाहिये।
मार्मिक बात
‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—इस बातको खूब गहरा उतरकर समझनेसे साधकको इसका यथार्थ अनुभव हो जाता है। यथार्थ अनुभव होनेकी कसौटी यह है कि अगर उसकी कोई प्रशंसा करे कि ‘आपका सिद्धान्त बहुत अच्छा है’ आदि, तो उसको अपनेमें बड़प्पनका अनुभव नहीं होना चाहिये। संसारमें कोई आदर करे या निरादर—इसका भी
साधकपर असर नहीं होना चाहिये। अगर कोई कह दे कि ‘संसार नहीं है और परमात्मा हैं—यह तो आपकी कोरी कल्पना है और कुछ नहीं’ आदि, तो ऐसी काट-छाँटसे साधकको किंचिन्मात्र भी बुरा नहीं लगना चाहिये। उग बातको सिद्ध करनेके लिये दृष्टान्त देनेकी, प्रमाण खोजनेकी इच्छा ही नहीं होनी चाहिये और कभी भी ऐसा भाव नहीं होना चाहिये कि ‘यह हमारा सिद्धान्त है, यह हमारी मान्यता है, इसको हमने ठीक समझा है’ आदि। अपने सिद्धान्तके विरुद्ध कोई कितना ही विवेचन करे, तो भी अपने सिद्धान्तमें किसी कमीका अनुभव नहीं होना चाहिये और अपनेमें कोई विकार भी पैदा नहीं होना चाहिये। अपना यथार्थ अनुभव स्वाभाविकरूपसे सदा-सर्वदा अटल और अखण्डरूपसे बना रहना चाहिये। इसके विषयमें साधकको कभी सोचना ही नहीं पड़े।
परिशिष्ट भाव—‘मया तत्मिदं सर्वम्’ कहनेका तात्पर्य है कि बर्फमें जलकी तरह संसारमें सत्ता (‘है’)—रूपसे एक सम, शान्त, सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है। जिसका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है, उस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। अज्ञानके कारण संसारमें जो सत्ता प्रतीत हो रही है, वह भी परमात्मतत्त्वकी सत्ताके कारण ही है। जब सबमें एक अविभक्त सत्ता (‘है’) ही परिपूर्ण है तो फिर उसमें मैं, तू, यह और वह—ये चार विभाग कैसे हो सकते हैं? अहंता और ममता कैसे हो सकती है? राग-द्वेष कैसे हो सकते हैं? जिसकी सत्ता ही नहीं है, उसको मिटानेका अभ्यास भी कैसे हो सकता है?
भगवान्ने ‘मत्स्थानि सर्वभूतानि ’ के लिये ‘न च मत्स्थानि भूतानि ’ पद कहे हैं और ‘मया तत्मिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ’ के लिये ‘न चाहं तेष्ववस्थितः ’ पद कहे हैं। जबतक साधकमें यह भाव है कि परमात्मा और संसार दो हैं, तबतक उसको यह समझना चाहिये कि परमात्मामें संसार है और संसारमें परमात्मा हैं (गीता—छठे अध्यायका तीसवाँ श्लोक)। परन्तु जब दोका भाव न हो, तब न परमात्मामें संसार है और न संसारमें परमात्मा हैं।
संसारको स्वतन्त्र सत्ता जीवने ही दी है—‘ययेदं धार्यते जगत् ’ (गीता ७।५) संसारकी स्वतन्त्र सत्ता अहंता, ममता और कामनाके कारण ही है। अतः जबतक अहंता, ममता और कामना है, तबतक (साधककी दृष्टिमें) परमात्मामें संसार है और संसारमें परमात्मा हैं। परन्तु अहंता, ममता और कामनाके मिटनेपर (सिद्धकी दृष्टिमें) न परमात्मामें संसार है, न संसारमें परमात्मा हैं अर्थात् परमात्मा-ही-परमात्मा हैं—‘वासुदेवः सर्वम् ’।
परमात्मामें संसार है, संसारमें परमात्मा हैं—यह ‘ज्ञान’ है और न परमात्मामें संसार है, न संसारमें परमात्मा हैं अर्थात् परमात्माके सिवाय कुछ नहीं है—यह ‘विज्ञान’ है।
श्रीमद्भागवतमें आया है कि जबतक साधककी दृष्टिमें जगत्की स्वतन्त्र सत्ता है, तबतक वह अपने बर्तावके द्वारा प्राणियोंमें भगवद्बुद्धिसे उपासना करे। परन्तु जब उसकी दृष्टिमें जगत्की सत्ता न रहे अर्थात् केवल भगवान् ही रह जायें, तब ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इस चिन्तनसे भी उपराम हो जायें।
१-यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावे नोपजायते। तावदेवमुपासीत वाङ्मनःकायवृत्तिभिः॥
(श्रीमद्भा० ११।२१।१७)
‘जबतक सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरा भाव अर्थात् ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’ ऐसा वास्तविक भाव न होने लगे, तबतक इस प्रकार मन, वाणी और शरीरकी सभी वृत्तियों-(बर्ताव- ) से मेरी उपासना करता रहे।’
२-सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्मनीषया। परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशयः॥
(श्रीमद्भा० ११।२१।१८)