भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 644

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

६४२

'प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवामि' (गीता ४।६) अर्थात् वे प्रकृतिको अधिकृत करके प्रकट होते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि सामान्य प्राणी तो प्रकृतिके परवश होकर जन्म लेते हैं तथा प्रकृतिके आश्रित होकर ही कर्म करते हैं, पर भगवान् स्वेच्छासे, स्वतन्त्रतासे अवतार लेते हैं और प्रकृति भी उनकी अध्यक्षतामें काम करती है।

मूढ़लोग मेरे अवतारके तत्त्वको न जानकर मेरेको मनुष्यशरीरके आश्रित (शरण) मानते हैं अर्थात् उनको होना तो चाहिये मेरे शरण, पर मानते हैं मेरेको मनुष्यशरीरके शरण! तो वे मेरे शरण कैसे होंगे? हो ही नहीं सकते। यही बात भगवान्ने सातवें अध्यायमें कही है कि बुद्धिहीन लोग मेरे अज-अविनाशी परमभावको न जानते

परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें भगवान्के प्रभावका विशेष वर्णन हुआ है। भगवान्से बड़ा कोई ईश्वर नहीं है। वे सर्वोपरि हैं। परन्तु अज्ञानी मनुष्य उनको स्वरूपसे नहीं जानते। वे अलौकिक भगवान्को भी अपनी तरह लौकिक समझते हैं।

कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण एक योगी थे, ईश्वर नहीं थे। योगके आठ अंग हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि (योगदर्शन द्वितीयपाद, उन्तीसवें सूत्र)। इनमें सबसे पहले 'यम' आता है। यम पाँच हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (योगदर्शन द्वितीयपाद, तीसवें सूत्र)। अतः जो योगी होगा, वह 'यम' का पालन अवश्य करेगा अर्थात् वह सत्य ही बोलेगा। अगर वह असत्य बोलता है तो वह योगी नहीं हो सकता; क्योंकि उसने योगके पहले अंग (यम)-का ही पालन नहीं किया! गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने जगह-जगह अपनेको ईश्वर कहा है। अतः अगर वे योगी हैं तो वे सत्य बोलते हैं और अगर वे सत्य बोलते हैं तो वे समग्र ईश्वर हैं—यह मानना ही पड़ेगा।

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपनी अवज्ञाका फल बताते हैं।

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥

आसुरीम्= (जो) आसुरी,विचेतसः= ऐसे अविवेकीमोघज्ञानाः= सब ज्ञान व्यर्थ
राक्षसीम्= राक्षसीमोघाशाःमनुष्योंकीहोते हैं अर्थात्
= औरसब आशाएँ व्यर्थउनकी आशाएँ,
मोहिनीम्= मोहिनीहोती हैं,कर्म और ज्ञान
प्रकृतिम्= प्रकृतिकामोघकर्माणः= सब शुभकर्म(समझ) सत्-
एव= हीव्यर्थ होते हैंफल देनेवाले नहीं
श्रिताः= आश्रय लेते हैं,(और)होते।

१-इस अध्यायके चौथे श्लोकसे दसवें श्लोकतक जिस परमात्माका वर्णन हुआ है, उसीको यहाँ 'माम्' पदसे कहा गया है।

२-'भूतानामीश्वरोऽपि सन्' (४।६), 'सर्वलोकमहेश्वरम्' (५।२९), 'मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति' (७।७), 'मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' (९।४), 'यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्' (१०।३), 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' (१५।१५) आदि-आदि।