श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
परिशिष्ट भाव —गीताकी पुण्यिकामें ‘ब्रह्मविद्यायाम्’, ‘योगशास्त्रे’ और ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवादे’—ये तीन पद तो एकवचनमें आये हैं, पर ‘श्रीमद्भगवद्गीतासु’ और ‘उपनिषत्सु’—ये दो पद बहुवचनमें आये हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवद्वाणी सम्पूर्ण उपनिषदोंमें श्रीमद्भगवद्गीता भी एक उपनिषद् है, जिसमें ‘ब्रह्मविद्या’ (ज्ञानयोग), ‘योगशास्त्र’ (कर्मयोग) और ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवाद’ (भक्तियोग)—तीनों आये हैं।
गीतामें ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवाद’का आरम्भ और अन्त भक्तिमें ही हुआ है। आरम्भमें अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ होकर भगवान्के शरण होते हैं। ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ (२।७) और अन्तमें भगवान्के द्वारा ‘मामेकं शरणं ब्रज’ पदोंसे पूर्ण शरणागतिकी प्रेरणा करनेपर अर्जुन पूर्णतया शरणागत हो जाते हैं।—‘करिष्ये वचनं तव’ (१८।७३)। अर्जुनने अपने श्रेय—(कल्याण—) का उपाय पूछा था (२।७, ३।२, ५।१), इसलिये भगवान्ने गीतामें ‘ज्ञानयोग’ और ‘कर्मयोग’ का भी वर्णन किया है।
पहले अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ प्रथमोऽध्यायः’ के तीन, ‘धृतराष्ट्र उवाच’ ‘सञ्जय उवाच’ आदि पदोंके बारह, श्लोकोंके पाँच सौ अष्टावन और पुण्यिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग पाँच सौ छियासी है।
(२) इस अध्यायमें ‘अथ प्रथमोऽध्यायः’ के सात, ‘धृतराष्ट्र उवाच’ ‘सञ्जय उवाच’ आदि पदोंके सौतीस, श्लोकोंके एक हजार पाँच सौ चार और पुण्यिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार पाँच सौ छियानवे है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें छः ‘उवाच’ हैं—एक ‘धृतराष्ट्र उवाच’, तीन ‘सञ्जय उवाच’ और दो ‘अर्जुन उवाच’।
पहले अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके सौतालीस श्लोकोंमेंसे—पाँचवें और तैंतीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा तैंतालीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; और पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा नवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष बयालीस श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।