श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 659, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें६५८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपनी उपासनाकी बात कह करके अब भगवान् अन्य देवताओंकी उपासनाकी बात कहते हैं।
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
कौन्तेय = हे कुन्तीन्न्दन! ये = जो अपि = भी भक्ताः = भक्त (मनुष्य) श्रद्धया, अन्विताः = श्रद्धापूर्वक
अन्यदेवताः = अन्य देवताओंका यजन्ते = पूजन करते हैं, ते = वे अपि = भी माम् = मेरा एव = ही
यजन्ति = पूजन करते हैं, अविधिपूर्वकम् = (पर करते हैं) अविधिपूर्वक अर्थात् देवताओंको मुझसे अलग मानते हैं।
व्याख्या—'येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः'—देवताओंके जिन भक्तोंको 'सब कुछ मैं ही हूँ' (सदसच्चाहम् ९। १९)—यह समझमें नहीं आया है और जिनकी श्रद्धा अन्य देवताओंपर है, वे उन देवताओंका ही श्रद्धापूर्वक पूजन करते हैं। वे देवताओंको मेरेसे अलग और बड़ा मानकर अपनी-अपनी श्रद्धा-भक्तिके अनुसार अपने-अपने इष्ट देवताके नियमोंको धारण करते हैं। इन देवताओंकी कृपासे ही हमें सब कुछ मिल जायगा—ऐसा समझकर नित्य-निरन्तर देवताओंकी ही सेवा-पूजामें लगे रहते हैं।
यहाँ मेरेसे देवताओंकी अलग (स्वतन्त्र) सत्ता मानकर जो देवताओंका पूजन करना है, यही अविधिपूर्वक पूजन करना है।
इस श्लोकका निष्कर्ष यह निकला कि (१) अपनेमें किसी प्रकारकी किंचिन्मात्र भी कामना न हो और उपास्यमें भगवद्बुद्धि हो, तो अपनी-अपनी रुचिके अनुसार किसी भी प्राणीको, मनुष्यको और किसी भी देवताको अपना उपास्य मानकर उसकी पूजा की जाय, तो वह सब भगवान्का ही पूजन हो जायगा और उसका फल भगवान्की ही प्राप्ति होगा; और (२) अपनेमें किंचिन्मात्र भी कामना हो और उपास्यरूपमें साक्षात् भगवान् हों तो वह अर्थार्थी, आर्त आदि भक्तोंकी श्रेणीमें आ जायगा, जिनको भगवान्ने उदार कहा है (सातवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)।
'तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्'—देवताओंका पूजन करनेवाले भी वास्तवमें मेरा ही पूजन करते हैं; क्योंकि तत्त्वसे मेरे सिवाय कुछ है ही नहीं। मेरेसे अलग उन देवताओंकी सत्ता ही नहीं है। वे मेरे ही स्वरूप हैं। अतः उनके द्वारा किया गया देवताओंका पूजन भी वास्तवमें मेरा ही पूजन है, पर है अविधिपूर्वक। अविधिपूर्वक कहनेका मतलब यह नहीं है कि पूजनसामग्री कैसी होनी चाहिये? उनके मन्त्र कैसे होने चाहिये? उनका पूजन कैसे होना चाहिये? आदि-आदि विधियोंका उनको ज्ञान नहीं है। इसका मतलब है—मेरेको उन देवताओंसे अलग मानना। जैसे कामनाके कारण ज्ञान हरा जानेसे वे देवताओंके शरण होते हैं (गीता—सातवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक), ऐसे ही
वास्तवमें सब कुछ भगवान् ही हैं। अतः जिस किसीकी उपासना की जाय, सेवा की जाय, हित किया जाय, वह प्रकारान्तरसे भगवान्की ही उपासना है। जैसे आकाशसे बरसा हुआ पानी नदी, नाला, झरना आदि बनकर अन्तमें समुद्रको ही प्राप्त होता है (क्योंकि वह जल समुद्रका ही है), ऐसे ही मनुष्य जिस किसी भी पूजन करे, वह तत्त्वसे भगवान्का ही पूजन होता है*। परन्तु पूजकको लाभ तो अपनी-अपनी भावनाके अनुसार ही होता है।
परिशिष्ट भाव—'त्रैविद्या माम्' (९। २०), 'अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्' (९। २२) और 'तेऽपि मामेव' (९। २३)—तीनों जगह भगवान्के लिये 'माम्' शब्द देनेका तात्पर्य है कि सब कुछ भगवान् ही हैं, इसलिये भगवान् सबको अपना ही स्वरूप जानते हैं। अगर मनुष्यमें कामना न हो और सबमें भगवद्बुद्धि हो तो वह किसी भी उपासना करे, वह वास्तवमें भगवान्की ही उपासना है। तात्पर्य है कि अगर निष्कामभाव और भगवद्बुद्धि हो जाय तो उसका
- आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्। सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति ॥ (लौगाक्षिमृति )