श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 664, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २६ ]
- साधक-संजीवनी *
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प्रश्न है और यह उसका उत्तर है। इससे उसने बहुत रुपये कमाये।
अब उस विद्याके चमत्कारको देखकर एक सज्जन उसके पीछे पड़ गये कि 'मेरेको भी यह विद्या सिखाओ, मैं भी इसको सीखना चाहता हूँ।' तो उसने सरलतासे कहा कि 'यह विद्या चमत्कारी तो बहुत है, पर वास्तविक हित, कल्याण करनेवाली नहीं है।' उससे यह पूछा गया कि 'आप दूसरेके बिना कहे ही उसके प्रश्नको और उत्तरको कैसे जान जाते हो?' तो उसने कहा कि 'मैं अपने कानमें बिछा लगाये रखता हूँ। जब कोई पूछने आता है, तो उस समय कर्णपिशाचिनी आकर मेरे कानमें उसका प्रश्न और प्रश्नका उत्तर सुना देती है और मैं वैसा ही कह देता हूँ।' फिर उससे पूछा गया कि 'आपका मरना कैसे होगा—इस विषयमें आपने कुछ पूछा है कि नहीं?' इसपर उसने कहा कि 'मेरा मरना तो नर्मदाके किनारे होगा।' उसका शरीर शान्त होनेके बाद पता लगा कि जब वह (अपना अन्त-समय जानकर) नर्मदामें जाने लगा, तब कर्णपिशाचिनी सूकरी बनकर उसके सामने आ गयी। उसको देखकर वह
परिशिष्ट भाव— 'व्रत' का अर्थ है—नियम। अतः 'देवव्रत' शब्दका अर्थ हुआ—देवताओंकी उपासनाके नियमोंको धारण करना (गीता—सातवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। भगवान्के शरण होकर उन्हींके लिये कर्म करना भगवान्का पूजन है—'स्वकर्मणा तमभ्यर्थ्य सिद्धिं विन्दति मानवः ' (गीता १८।४६)।
मात्र क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करनेसे सब भगवान्का पूजन हो जाता है (गीता—नवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)। निष्कामभाव और भगवद्वृद्धि होनेसे कोई निषिद्ध क्रिया हो ही नहीं सकती; क्योंकि कामनाके कारण ही निषिद्ध क्रिया होती है (गीता—तीसरे अध्यायका छत्तीसवाँ-सैंतीसवाँ श्लोक)।
वास्तवमें सब कुछ भगवान्का ही रूप है। परन्तु जो भगवान्के सिवाय दूसरी कोई भी स्वतन्त्र सत्ता मानता है, उसका उद्धार नहीं होता। वह ऊँचे-से-ऊँचे लोकोंमें भी चला जाय तो भी उसको लौटकर संसारमें आना ही पड़ता है (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—देवताओंके पूजनमें तो बहुत-सी सामग्री, नियमों और विधियोंकी आवश्यकता होती है, फिर आपके पूजनमें तो और भी ज्यादा कठिनता होती होगी? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहतमशनामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥
| यः | = जो भक्त | भक्त्या | = प्रेमपूर्वक | भक्त्युपहतम् | = प्रेमपूर्वक दिये हुए |
|---|---|---|---|---|---|
| पत्रम् | = पत्र, | मे | = मेरे | उपहार-(भेंट-) | |
| पुष्पम् | = पुष्प, | प्रयच्छति | = अर्पण करता है, | को | |
| फलम् | = फल, | तत् | = उस (मुझमें) | अहम् | = मैं |
| तोयम् | = जल आदि-(यथा-साध्य एवं अनायास प्राप्त वस्तु-) | प्रयतात्मनः | = तल्लीन हुए अन्तः-करणवाले भक्तके द्वारा | अशनामि | = खा लेता हूँ अर्थात् स्वीकार कर लेता हूँ। |