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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 666

श्लोक २७]

  • साधक-संजीवनी *

६६५

(भक्तिपूर्ण) होना चाहिये। जैसे, कोई अत्यधिक गुरुभक्त शिष्य हो, तो गुरुकी सेवामें उसका जितना समय, वस्तु, क्रिया लगती है, उतना ही उसको आनन्द आता है, प्रसन्नता होती है। इसी तरह पतिकी सेवामें समय, वस्तु, क्रिया लगनेपर पतिव्रता स्त्रीको बड़ा आनन्द आता है; क्योंकि पतिकी सेवामें ही उसको अपने जीवनकी और वस्तुकी सफलता दीखती है। ऐसे ही भक्तका भगवान्के प्रति प्रेम-भाव होता है, तो वस्तु चाहे छोटी हो या बड़ी हो, साधारण हो या कीमती हो, उसको भगवान्के अर्पण करनेमें भक्तको बड़ा आनन्द आता है। उसका भाव यह रहता है कि वस्तुमात्र भगवान्की ही है। मेरेको भगवान्ने सेवा-पूजाका अवसर दे दिया है—यह मेरेपर भगवान्की विशेष कृपा हो गयी है! इस कृपाको देख-देखकर वह प्रसन्न होता रहता है।

भावपूर्वक लगाये हुए भोगको भगवान् अवश्य स्वीकार करते हैं, चाहे हमें दीखे या न दीखे। इस विषयमें एक आचार्य कहते थे कि हमारे मन्दिरमें दीवालीसे होलीतक अर्थात् सरदीके दिनोंमें ठाकुरजीको पिस्ता, बादाम, अखरोट, काजू, चिरौंजी आदिका भोग लगाया जाता था; परन्तु जब यह बहुत मँहगा हो गया, तब हमने मूँगफलीका भोग

लगाना शुरू कर दिया। एक दिन रातमें ठाकुरजीने स्वप्नमें कहा—‘अरे यार! तू मूँगफली ही खिलायेगा क्या?’ उस दिनेके बाद फिर मेवाका भोग लगाना शुरू कर दिया। उनको यह विश्वास हो गया कि जब ठाकुरजीको भोग लगाते हैं, तब वे उसे अवश्य स्वीकार करते हैं।

भोग लगानेपर जिन वस्तुओंको भगवान् स्वीकार कर लेते हैं, उन वस्तुओंमें विलक्षणता आ जाती है अर्थात् उन वस्तुओंमें स्वाद बढ़ जाता है, उनमें सुगन्ध आने लगती है; उनको खानेपर विलक्षण तृप्ति होती है, वे चीजें कितने ही दिनोंतक पड़ी रहनेपर भी खराब नहीं होतीं; आदि-आदि। परन्तु यह कसौटी नहीं है कि ऐसा होता ही है। कभी भक्तका ऐसा भाव बन जाय तो भोग लगायी हुई वस्तुओंमें ऐसी विलक्षणता आ जाती है—ऐसा हमने सन्तोसे सुना है।

मनुष्य जब पदार्थोंकी आहुति देते हैं तो वह यज्ञ हो जाता है; चीजोंको दूसरोंको दे देते हैं तो वह दान कहलाता है, संयमपूर्वक अपने काममें न लेनेसे वह तप हो जाता है और भगवान्के अर्पण करनेसे भगवान्के साथ योग (सम्बन्ध) हो जाता है—ये सभी एक ‘त्याग’के ही अलग-अलग नाम हैं।

परिशिष्ट भाव —देवताओंकी उपासनामें तो अनेक नियमोंका पालन करना पड़ता है (गीता—सातवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक); परन्तु भगवान्की उपासनामें कोई नियम नहीं है। भगवान्की उपासनामें प्रेमकी, अपनेपनकी प्रधानता है, विधिकी नहीं—‘भक्त्या प्रयच्छति ’, ‘भक्त्युपहत्तम् ’।

जैसे भोला बालक जो कुछ हाथमें आये, उसको मुँहमें डाल लेता है, ऐसे ही भोले भक्त भगवान्को जो भी अर्पण करते हैं, उसको भगवान् भी भोले बनकर खा लेते हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ’ (गीता ४।११); जैसे—विदुरानीने केलेका छिलका दिया तो भगवान्ने उसको ही खा लिया!

भक्त्या प्रयच्छति ’ का तात्पर्य है कि भक्त वस्तुको प्रेमपूर्वक भगवान्के अर्पण करता है, किसी कामनासे नहीं। देवताओंकी उपासनामें तो वस्तुविशेषकी आवश्यकता होती है, पर भगवान्की उपासनामें वस्तुविशेषकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत प्रेमकी आवश्यकता है।

सम्बन्ध—संसारमात्रके दो रूप हैं—पदार्थ और क्रिया। इनमें आसक्ति होनेसे ये दोनों ही पतन करनेवाले होते हैं। अतः ‘पदार्थ’ अर्पण करनेकी बात पूर्वश्लोकमें कह दी और अब आगेके श्लोकमें ‘क्रिया’ अर्पण करनेकी बात कहते हैं।

यत्करोषि यदश्नासि यजुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीपुत्र! (तू)यत्= जो कुछयत्= जो कुछ
यत्= जो कुछजुहोषि= यज्ञ करता है,तपस्यसि= तप करता है,
करोषि= करता है,यत्= जो कुछतत्= वह (सब)
यत्= जो कुछददासि= दान देता हैमदर्पणम्= मेरे अर्पण
अश्नासि= भोजन करता है,(और)कुरुष्व= कर दे।