श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 671, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
सम्बन्ध—अब एक शंका होती है कि जो भगवान् के समर्पित होते हैं, उनको तो भगवान् मुक्त कर देते हैं और जो भगवान् के समर्पित नहीं होते, उनको भगवान् मुक्त नहीं करते—इसमें तो भगवान्की दयालुता और समता नहीं हुई, प्रत्युत विषम-दृष्टि और पक्षपात हुआ? इसपर कहते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥
| अहम् | = मैं | अस्ति | = है (और) | भजन्ति | = भजन करते हैं, |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वभूतेषु | = सम्पूर्ण प्राणियोंमें | न | = न कोई | ते | = वे |
| समः | = समान हूँ। | प्रियः | = प्रिय है। | मयि | = मुझमें हैं |
| न | = (उन प्राणियोंमें) न | तु | = परन्तु | च | = और |
| तो कोई | ये | = जो | अहम् | = मैं | |
| मे | = मेरा | भक्त्या | = प्रेमपूर्वक | अपि | = भी |
| द्वेष्यः | = द्वेषी | माम् | = मेरा | तेषु | = उनमें हूँ।१ |
व्याख्या —‘समोऽहं सर्वभूतेषु’—मैं स्थावर-जंगम आदि सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्यापकरूपसे और कृपा-दृष्टिसे सम हूँ। तात्पर्य है कि मैं सबमें समानरूपसे व्यापक, परिपूर्ण हूँ—‘मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ (गीता ९।४), और मेरी सबपर समानरूपसे कृपादृष्टि है—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)।
मैं कहीं कम हूँ और कहीं अधिक हूँ अर्थात् चींटी छोटी होनेसे उसमें कम हूँ और हाथी बड़ा होनेसे उसमें अधिक हूँ; अन्त्यजमें कम हूँ और ब्राह्मणमें अधिक हूँ; जो मेरे प्रतिकूल चलते हैं, उनमें मैं कम हूँ और जो मेरे अनुकूल चलते हैं, उनमें मैं अधिक हूँ—यह बात है ही नहीं। कारण कि सब-के-सब प्राणी मेरे अंश हैं, मेरे स्वरूप हैं। मेरे स्वरूप होनेसे वे मेरेसे कभी अलग नहीं हो सकते और मैं भी उनसे कभी अलग नहीं हो सकता। इसलिये मैं सबमें समान हूँ, मेरा कहीं कोई पक्षपात नहीं है। तात्पर्य यह हुआ कि प्राणियोंमें जन्मसे, कर्मसे, परिस्थितिसे, घटनासे, संयोग, वियोग आदिसे अनेक तरहसे विषमता होनेपर भी मैं सर्वथा-सर्वदा सबमें समान रीतिसे व्यापक हूँ, कहीं कम और कहीं ज्यादा नहीं हूँ।
‘न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः’२—पहले भगवान्ने कहा कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ, अब उसीका विवेचन करते हुए कहते हैं कि कोई भी प्राणी मेरे राग-द्वेषका
विषय नहीं है। तात्पर्य है कि मेरेसे विमुख होकर कोई प्राणी शास्त्रीय यज्ञ, दान आदि कितने ही शुभकर्म करे, तो भी वह मेरे ‘राग’ का विषय नहीं है और दूसरा शास्त्रनिषिद्ध अन्याय, अत्याचार आदि कितने ही अशुभकर्म करे, तो भी वह मेरे ‘द्वेष’ का विषय नहीं है। कारण कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान रीतिसे व्याप्त हूँ, सबपर मेरी समान रीतिसे कृपा है और सब प्राणी मेरे अंश होनेसे मेरेको समान रीतिसे प्यारे हैं। हाँ, यह बात जरूर है कि जो सकामभावपूर्वक शुभकर्म करेगा, वह ऊँची गतिमें जायगा और जो अशुभ-कर्म करेगा, वह नीची गतिमें अर्थात् नरकों तथा चौरासी लाख योनियोंमें जायगा। परन्तु वे दोनों पुण्यात्मा और पापात्मा होनेपर भी मेरे राग-द्वेषके विषय नहीं हैं।
मेरे रचे हुए पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये भौतिक पदार्थ भी प्राणियोंके अच्छे-बुरे आचरणों तथा भावोंको लेकर उनको रहनेका स्थान देनेमें, उनकी प्यास बुझानेमें, उनको प्रकाश देनेमें, उनको चलने-फिरनेके लिये अवकाश देनेमें राग-द्वेषपूर्वक विषमता नहीं करते, प्रत्युत सबको समान रीतिसे देते हैं। फिर प्राणी अपने अच्छे-बुरे आचरणोंको लेकर मेरे राग-द्वेषके विषय कैसे बन सकते हैं? अर्थात् नहीं बन सकते। कारण कि वे साक्षात् मेरे ही अंश हैं, मेरे ही स्वरूप हैं।
जैसे, किसी व्यक्तिके एक हाथमें पीड़ा हो रही है, वह
१-इस श्लोकके दो विभाग हैं—पूर्वार्धमें तो भजन न करनेवालोंका वर्णन है और उत्तरार्धमें भजन करनेवालोंका वर्णन है।
२-यहाँ ‘प्रिय’ शब्दको रागका ही वाचक मानना चाहिये; क्योंकि प्राणिमात्रपर भगवान्की समान रीतिसे प्रियता है—‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस ७।८६।२); अतः भगवान् इसका निषेध कैसे कर सकते हैं? दूसरी बात, ‘द्वेष’ शब्दके साथ ‘राग’ शब्द ही ठीक बैठ सकता है; क्योंकि राग और द्वेष—यह द्वन्द्व है। इसी द्वन्द्वका यहाँ निषेध किया गया है।