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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 674, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 674

श्लोक ३० ]

  • साधक-संजीवनी *

६७३

है—‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’। तात्पर्य यह निकला कि विषमता भगवान्में नहीं है, प्रत्युत प्राणियोंने ही विषमता की है, जो कि भगवान्से विमुख हैं।

तत्त्वसे तो भगवान् ‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ हैं, पर अनुभव करनेमें भगवान् ‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’ हैं। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें समानरूपसे परिपूर्ण होनेपर भी भगवान्का अनुभव भक्त ही करते हैं, अन्य प्राणी नहीं। वास्तवमें अनुभव करनेकी शक्ति भी भगवान्से ही प्राप्त होती है। मनुष्यका काम केवल भगवान्के सम्मुख होना है।

रामायणमें आया है—

सातवें सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा ॥

(मानस, अरण्य० ३६। २)

तात्पर्य है कि भगवान्की सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान व्यापकता, प्रियता, कृपा तथा आत्मीयता है, पर भक्तोंमें वे विशेष दीखते हैं। भक्तोंमें यह विशेषता भगवान्में प्रेम होनेसे भगवत्कृपासे आती है और भगवान्की ही दी हुई होती है। भक्तोंकी भगवान्में जैसी तल्लीनता, प्रियता होती है, वैसी दूसरोंकी नहीं होती। इसलिये भगवान्की भी भक्तोंमें प्रियता होती है। भक्त और भगवान्की परस्पर प्रियताको ‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’ पदोंसे कहा गया है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ‘ये भजन्ति तु मां भक्त्या’ पदोंसे भक्तिपूर्वक अपना भजन करनेकी बात कही। अब आगेके श्लोकमें भजन करनेवालोंका विवेचन आरम्भ करते हैं।

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥

चेत्= अगर (कोई)भजते= भजन करताहि= कारण कि
सुदुराचारः= दुराचारी-से-है (तो)सः= उसने
दुराचारीसः= उसकोसम्यक्,
अपि= भीसाधुः= साधुव्यवसितः= निश्चय बहुत
अनन्यभाक्= अनन्यभक्त होकरएव= हीअच्छी तरह
माप्= मेरामन्तव्यः= मानना चाहिये।कर लिया है।

व्याख्या —[कोई करोड़पति या अरबपति यह बात कह दे कि मेरे पास जो कोई आयेगा, उसको मैं एक लाख रुपये दूँगा, तो उसके इस वचनकी परीक्षा तब होगी, जब उससे सर्वथा ही विरुद्ध चलनेवाला, उसके साथ वैर रखनेवाला, उसका अनिष्ट करनेवाला भी आकर उससे एक लाख रुपये माँगे और वह उसको दे दे। इससे सबको यह विश्वास हो जायगा कि यह जो माँगे, उसको दे देता है। इसी भावको लेकर भगवान् सबसे पहले दुराचारीका नाम लेते हैं।]

‘अपि चेत्’—सातवें अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें आया है कि जो पापी होते हैं, वे मेरे शरण नहीं होते और यहाँ कहा है कि दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है—इन दोनों बातोंमें आपसमें विरोध प्रतीत होता है। इस विरोधको दूर करनेके लिये ही यहाँ

‘अपि’ और ‘चेत्’ ये दो पद दिये गये हैं। तात्पर्य है कि सातवें अध्यायमें ‘दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं होते’ ऐसा कहकर उनके स्वभावका वर्णन किया है। परन्तु वे भी किसी कारणसे मेरे भजनमें लगना चाहें तो लग सकते हैं। मेरी तरफसे किसीको कोई मना नहीं है*; क्योंकि किसी भी प्राणीके प्रति मेरा द्वेष नहीं है। ये भाव प्रकट करनेके लिये ही यहाँ ‘अपि’ और ‘चेत्’ पदोंका प्रयोग किया है।

‘सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्’—जो सुष्ठु दुराचारी है, सांगोपांग दुराचारी है अर्थात् दुराचार करनेमें कोई कमी न रहे, दुराचारका अंग-उपांग न छूटे—ऐसा दुराचारी है, वह भी अनन्यभाक् होकर मेरे भजनमें लग जाय तो उसका उद्धार हो जाता है।

यहाँ ‘भजते’ क्रिया वर्तमानकी है, जिसका कर्ता

  • कोटि बिप्र बध लागहि जाहू।आई सरन तजई नहि ताहू॥

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस ५। ४४। १)