श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 677, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें६७६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ९
भावपर ही रहती है, आचरणोंपर नहीं-
‘रहित न प्रभु चित चूक किए की।
करत सुरति सय बार हिए की॥’
(मानस १।२९।३)
क्योंकि भगवान् भावग्राही हैं- ‘भावग्राही जनार्दन:।’
‘सम्यग्व्यवसितो हि स:’- दूसरे अध्यायमें कर्मयोगके
प्रकरणमें ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि’ की बात आयी है
(इकतालीसवाँ श्लोक) अर्थात् वहाँ बुद्धिमें यह
निश्चय होता है कि ‘मेरेको राग-द्वेष नहीं करने हैं,
कर्तव्य-कर्म करते हुए सिद्धि-असिद्धिमें सम रहना है।’
अतः कर्मयोगीकी बुद्धि व्यवसायात्मिका होती है और यहाँ
कर्ता स्वयं व्यवसित है- ‘सम्यग्व्यवसित:।’ कारण कि
‘मैं केवल भगवान्का ही हूँ, अब मेरा काम केवल भजन
करना ही है’- यह निश्चय स्वयंका है, बुद्धिका नहीं।
अतः सम्यक् निश्चयवालेकी स्थिति भगवान्में है। तात्पर्य
यह हुआ कि वहाँ निश्चय ‘करण’-(बुद्धि-) में है और
यहाँ निश्चय ‘कर्ता’-(स्वयं-) में है। करणमें निश्चय
होनेपर भी जब कर्ता परमात्मतत्त्वसे अभिन्न हो जाता है,
तो फिर कर्तामें निश्चय होनेपर करणमें भी निश्चय हो
जाय-इसमें तो कहना ही क्या है!
जहाँ बुद्धिका निश्चय होता है, वहाँ वह निश्चय
तबतक एकरूप नहीं रहता, जबतक स्वयं कर्ता उस
निश्चयके साथ मिल नहीं जाता। जैसे; सत्संग-स्वाध्यायके
समय मनुष्योंका ऐसा निश्चय होता है कि अब तो हम
केवल भजन-स्मरण ही करेंगे। परन्तु यह निश्चय सत्संग-
स्वाध्यायके बाद स्थिर नहीं रहता। इसमें कारण यह है कि
उनकी स्वयंकी स्वाभाविक रुचि केवल परमात्माकी तरफ
चलनेकी नहीं है, प्रत्युत साथमें संसारका सुख-आराम
आदि लेनेकी भी रुचि रहती है। परन्तु जब स्वयंका यह
निश्चय हो जाता है कि अब हमें परमात्माकी तरफ ही
चलना है, तो फिर यह निश्चय कभी मिटता नहीं; क्योंकि
यह निश्चय स्वयंका है।
जैसे, कन्याका विवाह होनेपर ‘अब मैं पतिकी हो
गयी, अब मेरेको पतिके घरका काम ही करना है’ ऐसा
निश्चय स्वयंमें हो जानेसे यह कभी मिटता नहीं, प्रत्युत
बिना याद किये ही हरदम याद रहता है। इसका कारण
यह है कि उसने स्वयंको ही पतिका मान लिया। ऐसे ही
जब मनुष्य यह निश्चय कर लेता है कि ‘मैं भगवान्का
हूँ और अब केवल भगवान्का ही काम (भजन) करना
है, भजनके सिवाय और कोई काम नहीं, किसी कामसे
कोई मतलब नहीं, तो यह निश्चय स्वयंका होनेसे सदाके
लिये पक्का हो जाता है, फिर कभी मिटता ही नहीं।’
इसलिये भगवान् कहते हैं कि उसको साधु ही मानना
चाहिये। केवल माननेकी ही बात नहीं, स्वयंका निश्चय
होनेसे वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है- ‘क्षिप्रं
भवति धर्मात्मा’ (९।३१)।
भक्तियोगकी दृष्टिसे सम्पूर्ण दुर्गुण-दुराचार भगवान्की
विमुखतापर ही टिके रहते हैं। जब प्राणी अनन्यभावसे
भगवान्के सम्मुख हो जाता है, तब सभी दुर्गुण-दुराचार
मिट जाते हैं।
परिशिष्ट भाव-ज्ञानयोग और कर्मयोगमें बुद्धिकी प्रधानता रहती है- ‘एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोगे
त्विमां शृणु’ (गीता २।३९)। इसलिये ज्ञानयोगी और कर्मयोगीकी बुद्धि व्यवसित होती है- ‘व्यवसायात्मिका
बुद्धिरेकेह’ (गीता २।४१), ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि:’ (गीता २।४४)। परन्तु भक्तियोगमें स्वयंकी प्रधानता रहती
है, इसलिये भक्त स्वयं व्यवसित होता है- ‘सम्यग्व्यवसितो हि स:।’
मन-बुद्धिमें बैठी हुई बातकी विस्मृति हो सकती है, पर स्वयंमें बैठी हुई बातकी विस्मृति नहीं हो सकती।
कारण कि मन-बुद्धि अपने साथ निरन्तर नहीं रहते, सुषुप्तिमें हमें उनके अभावका अनुभव होता है, पर स्वयंके
अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। उस स्वयंमें जो बात होती है, वह अखण्ड रहती है। इसलिये ‘मैं
भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’- यह स्वीकृति स्वयंमें होती है, मन-बुद्धिमें नहीं। एक बार यह स्वीकृति होनेपर
फिर कभी अस्वीकृति होती ही नहीं; क्योंकि स्वयं मूलमें भगवान्का ही अंश होनेसे भगवान्से अभिन्न है। परन्तु
भूलसे यह प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध स्वीकार कर लेता है (गीता-पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। अतः
वास्तवमें केवल अपनी भूल ही मिटती है। भूल मिटते ही भगवान्के नित्य-सम्बन्धकी स्वतः जागृति हो जाती है-
‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८।७३)। दूसरेके साथ सम्बन्ध माना था, यही भूल थी, मोह था।
सम्बन्ध-अब आगेके श्लोकमें सम्यक् निश्चयका फल बताते हैं।