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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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६७८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ९

जिसकी अहंतामें 'मैं चोर हूँ ही नहीं' ऐसा दृढ़ भाव है,

वह चोरी नहीं कर सकता। तात्पर्य यह हुआ कि अहंताके

परिवर्तनसे क्रियाओंका परिवर्तन हो जाता है।

इन दोनों दृष्टान्तोंसे यह सिद्ध हुआ कि कर्ता जैसा

होता है, उसके द्वारा वैसे ही कर्म होते हैं और जैसे कर्म

होते हैं, वैसा ही कर्तापन दृढ़ हो जाता है। ऐसे ही यहाँ

दुराचारी भी 'अनन्यभाक्' होकर अर्थात् 'मैं केवल

भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं' ऐसे

अनन्यभावसे भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तो

उसकी अहंतामें 'मैं भगवान्का हूँ, संसारका नहीं हूँ' यह

भाव दृढ़ हो जाता है, जो कि वास्तवमें सत्य है। इस प्रकार

अहंताके बदल जानेपर क्रियाओंमें किंचिन्मात्र कमी

रहनेपर भी वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है।

यहाँ शंका हो सकती है कि पूर्वश्लोकमें भगवान्

'सुराचार:' कहकर आये हैं, तो फिर यहाँ भगवान्ने

उसको 'धर्मात्मा' क्यों कहा है? इसका समाधान है कि

दुराचारीके दुराचार मिट जायँ, तो वह सदाचारी अर्थात्

धर्मात्मा ही होगा। अतः सदाचारी कहो या धर्मात्मा कहो-

एक ही बात है।

'शश्वच्छान्तिं निगच्छति' - केवल धार्मिक क्रियाओंसे

जो धर्मात्मा बनता है, उसके भीतर भोग और ऐश्वर्यकी

कामना होनेसे उसको भोग और ऐश्वर्य तो मिल सकते

हैं, पर शाश्वती शान्ति नहीं मिल सकती। दुराचारीकी

अहंता बदलनेपर जब वह भगवान्के साथ भीतरसे एक

हो जाता है, तब उसके भीतर कामना नहीं रह सकती,

असत्का महत्त्व नहीं रह सकता। इसलिये उसको निरन्तर

रहनेवाली शान्ति मिल जाती है।

दूसरा भाव यह है कि स्वयं परमात्माका अंश होनेसे

'चेतन अमल सहज सुखरासी' है। अतः उसमें अपने

स्वरूपकी जो अनादि अनन्त स्वतःसिद्ध शान्ति है, धर्मात्मा

होनेसे अर्थात् भगवान्के साथ अनन्यभावसे सम्बन्ध होनेसे

वह शाश्वती शान्ति प्राप्त हो जाती है। केवल संसारके साथ

सम्बन्ध माननेसे ही उसका अनुभव नहीं हो रहा था।

'कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति'-

यहाँ 'मेरे भक्तका पतन नहीं होता' ऐसी प्रतिज्ञा भगवान्

अर्जुनसे करवाते हैं, स्वयं नहीं करते। इसका आशय यह

है कि अभी युद्धका आरम्भ होनेवाला है और भगवान्ने

पहले ही हाथमें शस्त्र न लेनेकी प्रतिज्ञा कर ली है; परन्तु

जब आगे भीष्मजी यह प्रतिज्ञा कर लेंगे कि 'आजु जौ

हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ। तौ लाजों गंगा-जननीकों

शान्तनु सुत न कहाऊँ' तो उस समय भगवान्की प्रतिज्ञा

तो टूट जायगी, पर भक्त-(भीष्मजी-)की प्रतिज्ञा नहीं

टूटेगी। भगवान्ने चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'भक्तोऽसि

मे सखा चेति' कहकर अर्जुनको अपना भक्त स्वीकार

किया है। अतः भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि भैया! तू

प्रतिज्ञा कर ले। कारण कि तेरे द्वारा प्रतिज्ञा करनेपर अगर

मैं खुद भी तेरी प्रतिज्ञा तोड़ना चाहूँगा, तो भी तोड़ नहीं

सकूँगा, फिर और तोड़ेगा ही कौन? तात्पर्य हुआ कि अगर

भक्त प्रतिज्ञा करे, तो उस प्रतिज्ञाके विरुद्ध मेरी प्रतिज्ञा भी

नहीं चलेगी।

मेरे भक्तका विनाश अर्थात् पतन नहीं होता-यह

कहनेका तात्पर्य है कि जब वह सर्वथा मेरे सम्मुख हो गया

है, तो अब उसके पतनकी किंचिन्मात्र भी सम्भावना नहीं

रही। पतनका कारण तो शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मान

लेना ही था। उस माने हुए सम्बन्धसे सर्वथा विमुख होकर

जब वह अनन्यभावसे मेरे ही सम्मुख हो गया, तो अब

उसके पतनकी सम्भावना हो ही कैसे सकती है?

दुराचारी भी जब भक्त हो सकता है, तो फिर भक्त

होनेके बाद वह पुनः दुराचारी भी हो सकता है-ऐसा

न्याय कहता है। इस न्यायको दूर करनेके लिये भगवान्

कहते हैं कि यह न्याय यहाँ नहीं लगता। मेरे यहाँ तो

दुराचारी-से-दुराचारी भी भक्त बन सकते हैं, पर भक्त

होनेके बाद उनका फिर पतन नहीं हो सकता अर्थात् वे

फिर दुराचारी नहीं बन सकते। इस प्रकार भगवान्के

न्यायमें भी दया भरी हुई है। अतः भगवान् न्यायकारी और

दयालु-दोनों ही सिद्ध होते हैं।

परिशिष्ट भाव-जैसे रोगीका वैद्यके साथ सम्बन्ध हो जाता है, ऐसे ही अपनी निर्बलताका और भगवान्की

सर्वसमर्थताका विश्वास होनेपर मनुष्यका भगवान्के साथ सम्बन्ध हो जाता है। तात्पर्य है कि जब मनुष्य संसारके दुःखोंसे

घबरा जाता है और उनको मिटानेमें अपनी निर्बलता अनुभव करता है, पर साथ-ही-साथ उसमें यह विश्वास रहता

है कि सर्वसमर्थ भगवान्की कृपाशक्तिसे मेरी यह निर्बलता दूर हो सकती है, मैं सांसारिक दुःखोंसे बच सकता हूँ,

तब वह तत्काल 'भक्त' हो जाता है-'क्षिप्रं भवति धर्मात्मा'। भूखे व्यक्तिको अन्न मिल जाय तो क्या भोजन करनेमें

देरी लगेगी?

जबतक मनुष्यको अपनेमें कुछ बल, योग्यता, विशेषता दीखती है, तबतक वह 'अनन्यभाक्' नहीं होता। वह