श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
हैं, अपनी ओर खींचते रहते हैं तो भी वह प्रतिक्षण बढ़नेवाली मेरी भक्तिके प्रभावसे प्रायः विषयोंसे पराजित नहीं होता।' न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।
(महाभारत, अनु० १४९।१३९)
‘भगवान्के भक्तोंका कहीं कभी भी अशुभ नहीं होता।’
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तामू। बड़ रखवार रमापति जासू॥
(मानस, बाल० १२६।४)
‘कौन्तेय प्रतिजानीहि’—भगवान् अर्जुनको प्रतिज्ञा करनेके लिये कहते हैं; क्योंकि भक्तको प्रतिज्ञा भगवान् भी टाल नहीं सकते। भक्ति भगवान्की कमजोरी है। इसलिये भगवान्ने दुर्वासासे कहा है—
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। साधुभिर्गस्तद्वयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
(श्रीमद्भ० ९।४।६३)
‘हे द्विज! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं। मुझे भक्तजन बहुत प्रिय हैं। उनका मेरे हृदयपर पूर्ण अधिकार है।’
‘कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति’—इन पदोंसे साधकको यह दृढ़ विश्वास करना चाहिये कि मेरा पतन हो ही नहीं सकता; क्योंकि मैं भगवान्का ही हूँ।
सम्बन्ध—इस प्रकरणमें भगवान्ने अपनी भक्तिके सात अधिकारी बताये हैं। उनमेंसे दुराचारीका वर्णन दो श्लोकोंमें किया। अब आगेके श्लोकमें भक्तिके चार अधिकारियोंका वर्णन करते हैं।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ ३२॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन! | वैश्याः | = वैश्य | व्यपाश्रित्य | = सर्वथा मेरे शरण |
|---|---|---|---|---|---|
| ये | = जो | तथा | = और | होकर | |
| अपि | = भी | शूद्राः | = शूद्र (हों), | हि | = निःसन्देह |
| पापयोनयः | = पापयोंनिवाले | ते | = वे | पराम् | = परम |
| स्युः | = हों (तथा जो भी) | अपि | = भी | गतिम् | = गतिको |
| स्त्रियः | = स्त्रियाँ, | माम्, | यान्ति | = प्राप्त हो जाते हैं। |
व्याख्या —‘मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य ..... यान्ति परां गतिम्’—जिनके इस जन्ममें आचरण खराब हैं अर्थात् जो इस जन्मका पापी है, उसको भगवान्ने तीसवें श्लोकमें ‘दुराचारी’ कहा है। जिनके पूर्वजन्ममें आचरण खराब थे अर्थात् जो पूर्वजन्मके पापी हैं और अपने पुराने पापोंका फल भोगनेके लिये नीच योनियोंमें पैदा हुए हैं, उनको भगवान्ने यहाँ ‘पापयोंनि’ कहा है।
यहाँ ‘पापयोंनि’ शब्द ऐसा व्यापक है, जिसमें असुर, राक्षस, पशु, पक्षी आदि सभी लिये जा सकते हैं* और ये सभी भगवद्भक्तिके अधिकारी माने जाते हैं। शाण्डिल्य ऋषिने कहा है—‘आनिन्द्योऽन्यधिक्रियते परम्पर्यात्
सामान्यवत्।’ (शाण्डिल्य-भक्तिसूत्र ७८) अर्थात् जैसे दया, क्षमा, उदारता आदि सामान्य धर्मोंके मात्र मनुष्य अधिकारी हैं, ऐसे ही भगवद्भक्तिके नीची-से-नीची योनिसे लेकर ऊँची-से-ऊँची योनि तकके सब प्राणी अधिकारी हैं। इसका कारण यह है कि मात्र जीव भगवान्के अंश होनेसे भगवान्की तरफ चलनेमें, भगवान्की भक्ति करनेमें, भगवान्के सम्मुख होनेमें अनधिकारी नहीं हैं। प्राणियोंकी योग्यता-अयोग्यता आदि तो सांसारिक कार्योंमें हैं; क्योंकि ये योग्यता आदि बाह्य हैं और मिली हुई हैं तथा बिछुड़नेवाली हैं। इसलिये भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेमें योग्यता-अयोग्यता कोई कारण नहीं है अर्थात् जिसमें योग्यता है, वह
- केवलनेन हि भावेन गोष्यो गावो नगा मुगाः। येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरंजसा॥ (श्रीमद्भ० ११।१२।८)
‘गोपियाँ, गायें, वृक्ष, पशु, नाग तथा इस प्रकारके और भी मूढबुद्धि प्राणियोंने अनन्यभावके द्वारा सिद्ध होकर अनायास ही मेरी प्राप्ति कर ली है।’