श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 684, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३३ ]
- साधक-संजीवनी *
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किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥
पुण्याः | = (जो) पवित्र आचरण करने- वाले | भक्ताः | = भगवान्के भक्त हों, (वे परमगतिको प्राप्त हो जायें) | अनित्यम् | = अनित्य (और) ---|---|---|---|---|--- ब्राह्मणाः | = ब्राह्मण | किम्, पुनः | = इसमें तो कहना | असुखम् | = सुखरहित तथा | = और | ही क्या है ! | | लोकम् | = शरीरको राजर्षयः | = ऋषिस्वरूप क्षत्रिय | इमम् | = (इसलिये) इस | प्राप्य | = प्राप्त करके (तू) | | | | माम् | = मेरा | | | | भजस्व | = भजन कर।
व्याख्या —'किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता' राजर्षयस्तथा —जब वर्तमानमें पाप करनेवाला सांगोपांग दुराचारी और पूर्वजन्मके पापोंके कारण नीच योनियोंमें जन्म लेनेवाले प्राणी तथा स्त्रियाँ, वैश्य और शुद्ध—ये सभी मेरे शरण होकर, मेरा आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं, परम पवित्र हो जाते हैं, तो फिर जिनके पूर्वजन्मके आचरण भी अच्छे हों और इस जन्ममें भी उत्तम कुलमें जन्म हुआ हो, ऐसे पवित्र ब्राह्मण और पवित्र क्षत्रिय अगर मेरे शरण हो जायें, मेरे भक्त बन जायें, तो वे परमगतिको प्राप्त हो जायेंगे, इसमें कहना ही क्या है ! अर्थात् वे निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जायेंगे।
पहले तीसवें श्लोकमें जिसको दुराचारी कहा है, उसके विपक्षमें यहाँ 'पुण्याः ' पद आया है और बत्तीसवें श्लोकमें जिनको 'पापयोनयः ' कहा है, उनके विपक्षमें यहाँ 'ब्राह्मणाः ' पद आया है। इसका आशय है कि ब्राह्मण सदाचारी भी हैं और पवित्र जन्मवाले भी हैं। ऐसे ही इस जन्ममें जो शुद्ध आचरणवाले क्षत्रिय हैं, उनकी वर्तमानकी पवित्रताको बतानेके लिये यहाँ 'ऋषि ' शब्द आया है, और जिनके जन्मराष्ट्रभक्त कर्म भी शुद्ध हैं, यह बतानेके लिये यहाँ 'राजन् ' शब्द आया है।
पवित्र ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय—इन दोनोंके बीचमें 'भक्ताः ' पद देनेका तात्पर्य है कि जिनके पूर्वजन्मके आचरण भी शुद्ध हैं और जो इस जन्ममें भी सर्वथा पवित्र हैं, वे (ब्राह्मण और क्षत्रिय) अगर भगवान्की भक्ति करने लग जायें तो उनके उद्धारमें सन्देह हो ही कैसे सकता है ?
'पुण्या ब्राह्मणाः ,' 'राजर्षयः ' और 'भक्ताः —'ये तीन बातें कहनेका तात्पर्य यह हुआ कि इस जन्मके आचरणसे पवित्र और पूर्वजन्मके शुद्ध आचरणोंके कारण इस जन्ममें ऊँचे कुलमें पैदा होनेसे पवित्र—ये दोनों तो बाह्य
चीजें हैं। कारण कि कर्ममात्र बाहरसे (मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और शरीरसे) बनते हैं तो उनसे जो पवित्रता होगी, वह भी बाह्य ही होगी। इस बाह्य शुद्धिके वाचक ही यहाँ 'पुण्या ब्राह्मणाः ,' और 'राजर्षयः —'ये दो पद आये हैं। परन्तु जो भीतरसे स्वयं भगवान्के शरण होते हैं, उनके लिये अर्थात् स्वयंके लिये यहाँ 'भक्ताः ,' पद आया है।
'अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् —' यह मनुष्यजन्म अनन्त जन्मोंका अन्त करनेवाला होनेसे अन्तिम जन्म है। इस जन्ममें मनुष्य भगवान्के शरण होकर भगवान्को भी सुख देनेवाला बन सकता है। अतः यह मनुष्यजन्म पवित्र तो है, पर अनित्य है—'अनित्यम् ' अर्थात् नित्य रहनेवाला नहीं है; किस समय छूट जाय, इसका कुछ पता नहीं है। इसलिये जल्दी-से-जल्दी अपने उद्धारमें लग जाना चाहिये।
इस मनुष्यशरीरमें सुख भी नहीं है—'असुखम् ।' आठवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने मनुष्यजन्मको दुःखालय बताया है। इसलिये मनुष्यशरीर मिलनेपर सुखभोगके लिये ललचना नहीं चाहिये। ललचानेमें और सुख भोगनेमें अपना भाव और समय खराब नहीं करना चाहिये।
यहाँ 'इमं लोकम् ,' पद मनुष्यशरीरका वाचक है, जो कि केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है। मनुष्यशरीर पानेके बाद किसी पूर्वकर्मके कारण भविष्यमें इस जीवका दूसरा जन्म होगा—ऐसा कोई विधान भगवान्ने नहीं बनाया है, प्रत्युत केवल अपनी प्राप्तिके लिये ही यह अन्तिम जन्म दिया है। अगर इस जन्ममें भगवत्प्राप्ति करना, अपना उद्धार करना भूल गये, तो अन्य शरीरोंमें ऐसा मौका मिलेगा नहीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि इस मनुष्यशरीरको प्राप्त करके केवल मेरा भजन कर। मनुष्यमें जो कुछ विलक्षणता आती
- यहाँ 'भक्ताः ,' पद देहली-दीपक-न्यायसे ब्राह्मण और राजर्षि (क्षत्रिय)—इन दोनोंके लिये आया है।