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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

है। वे तो सब प्राणियोंमें समान हैं (गीता—इसी अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। परन्तु जो प्रेमपूर्वक भगवान्का भजन करता है, वह किसी भी देश, वेश, वर्ण, आश्रम, जाति, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, उसका भगवान्से घनिष्ठ सम्बन्ध है—‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’ (गीता ९। २९)। अतः दुराचारी, पापयोनि, स्त्रियाँ, वैश्य, शूद्र, ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये सातों भक्तोंमें एक हो जाते हैं, इनमें कोई भेद नहीं रहता। इसलिये भगवान् भजन करनेकी आज्ञा देते हैं—‘भजस्व माम्’। भजन करनेका अर्थ है—भगवान्के सम्मुख होना, भगवान्में प्रियता (अपनापन) होना, भगवान्की प्राप्तिका उद्देश्य होना। भगवद्वुद्धिसे दूसरोंकी सेवा करना, दूसरोंको देनेका भाव रखना, अभावग्रस्तोंकी सहायता करना—यह भी भजन है।

‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्’—अनित्य और सुखरहित इस शरीरको पाकर अर्थात् हम जीते रहें और सुख भोगते रहें—ऐसी कामनाको छोड़कर भगवान्का भजन करना चाहिये। कारण कि संसारमें सुख है ही नहीं, केवल सुखका भ्रम है। ऐसे ही जीनेका भी भ्रम है। हम जी नहीं रहे हैं, प्रत्युत प्रतिक्षण मर रहे हैं!

पहले उन्तीसवाँ श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि जो प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ। इसलिये यहाँ भगवान् भजन करनेकी आज्ञा देते हैं—‘भजस्व माम्’।

सम्बन्ध—उन्तीसवाँ श्लोकसे लेकर तैंतीसवाँ श्लोकतक भगवान्के भजनकी ही बात मुख्य आयी है। अब आगेके श्लोकमें उस भजनका स्वरूप बताते हैं।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि युक्तवैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥

मद्भक्तः= (तू) मेरा भक्तमाम्= (और) मुझेमत्परायणः= मेरे परायण हुआ
भव= हो जा,नमस्कुरु= नमस्कार कर।(तू)
मन्मनाः= मुझमें मनवाला हो जा,एवम्= इस प्रकारमाम्= मुझे
मद्याजी= मेरा पूजन करनेवाला हो जाआत्मानम्= अपने-आपकोएव= ही
युक्त्वा= (मेरे साथ)एष्यसि= प्राप्त होगा।
लगाकर

व्याख्या—[अपने हृदयकी बात वहीं कही जाती है, जहाँ सुननेवालेमें कहनेवालेके प्रति दोषदृष्टि न हो, प्रत्युत आदरभाव हो। अर्जुन दोषदृष्टिसे रहित हैं, इसलिये भगवान्ने उनको ‘अनसूयवे’ (९। १) कहा है। इसी कारण भगवान् यहाँ अर्जुनके सामने अपने हृदयकी गोपनीय बात कह रहे हैं।]

‘मद्भक्तः’—‘मेरा भक्त हो जा’ कहनेका तात्पर्य है कि तू केवल मेरे साथ ही अपनापन कर; केवल मेरे साथ ही सम्बन्ध जोड़, जो कि अनादिकालसे स्वतःसिद्ध है। केवल भूलसे ही शरीर और संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान रखा है अर्थात् ‘मैं अमुक वर्णका हूँ, अमुक आश्रमका हूँ, अमुक सम्प्रदायका हूँ, अमुक नामवाला हूँ’—इस प्रकार वर्ण, आश्रम आदिको अपनी अहंतामें मान रखा है। इसलिये अब असत्-रूपसे बनी हुई अवास्तविक अहंताको वास्तविक सत्-रूपमें बदल दे कि ‘मैं तुम्हारा हूँ और तुम

मेरे हो’। फिर तेरा मेरे साथ स्वाभाविक ही अपनापन हो जायगा, जो कि वास्तवमें है।

‘मन्मना भव’—मन वहीं लगता है, जहाँ अपनापन होता है, प्रियता होती है। तेरा मेरे साथ जो अखण्ड सम्बन्ध है, उसको मैं तो नहीं भूल सकता, पर तू भूल सकता है; इसलिये तेरेको ‘मेरेमें मनवाला हो जा’—ऐसा कहना पड़ता है।

‘मद्याजी’—‘मेरा पूजन करनेवाला हो’ अर्थात् तू खाना-पीना, सोना-जगना, आना-जाना, काम-धन्या करना आदि जो कुछ क्रिया करता है, वह सब-की-सब मेरी पूजाके रूपमें ही कर; उन सबको मेरी पूजा ही समझ।

‘मां नमस्कुरु’—‘मेरेको नमस्कार कर’ कहनेका तात्पर्य है कि मेरा जो कुछ अनुकूल, प्रतिकूल या सामान्य विधान हो, उसमें तू परम प्रसन्न रह। मैं चाहे तेरे मन और मान्यतासे सर्वथा विरुद्ध फैसला दे दूँ, तो भी उसमें तू प्रसन्न

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