श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 696, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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दूसरोंकी वाणीमें तो मतभेद रहता है, पर भगवान्की वाणी सर्वसम्मत है। भगवान् योगमें स्थित होकर गीता कह रहे हैं; अतः उनके वचन विशेष कल्याण करनेवाले हैं। भगवान्का योगमें स्थित होना क्या है? भगवान् सामान्यरूपसे मात्र प्राणियोंके परम सुहृद् हैं, पर जब कोई व्याकुल होकर उनकी शरणमें आता है, तब भगवान्के हृदयमें उसके हितके विशेष भाव प्रकट होते हैं—यही भगवान्का योगमें स्थित होना है; जैसे—बछड़ेके सामने आते ही गायके शरीरमें रहनेवाला दूध उसके थनोंमें आ जाता है!
‘यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया’ पदोंसे भगवान् कहते हैं कि तुम्हारे भीतर मेरे प्रति प्रेमका भाव है और मेरे भीतर तुम्हारे प्रति हितका भाव है, इसलिये मैं वह विज्ञानसहित ज्ञान पुनः कहूँगा, जो मैंने सातवें और नवें अध्यायमें कहा है। इससे सिद्ध होता है कि सातवों, नवों और दसवों—तीनों अध्यायोंमें भगवान्ने प्राणिमात्रके हितकी कामनासे अपने हृदयकी बात कही है!
सम्बन्ध—परम वचनके विषयमें, जिसे मैं आगे कहूँगा, मेरे सिवाय पूरा-पूरा बतानेवाला अन्य कोई नहीं मिल सकता। इसका कारण क्या है? इसे भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥
| मे | = मेरे | (और) | सर्वशः | = सब प्रकारसे |
|---|---|---|---|---|
| प्रभवम् | = प्रकट होनेको | न | = न | देवानाम् |
| न | = न | महर्षयः | = महर्षि; | च |
| सुरगणाः | = देवता | हि | = क्योंकि | महर्षीणाम् |
| विदुः | = जानते हैं | अहम् | = मैं | आदिः |
व्याख्या—‘न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः’—यद्यपि देवताओंके शरीर, बुद्धि, लोक, सामग्री आदि सब दिव्य हैं, तथापि वे मेरे प्रकट होनेको नहीं जानते। तात्पर्य है कि मेरा जो विश्वरूपसे प्रकट होना है, मत्स्य, कच्छप आदि अवताररूपसे प्रकट होना है, सृष्टिमें क्रिया, भाव और विभूतिरूपसे प्रकट होना है, ऐसे मेरे प्रकट होनेके उद्देश्यको, लक्ष्यको, हेतुओंको देवता भी पूरा-पूरा नहीं जानते। मेरे प्रकट होनेको पूरा-पूरा जानना तो दूर रहा, उनको तो मेरे दर्शन भी बड़ी कठिनासे होते हैं। इसलिये वे मेरे दर्शनके लिये हरदम लालायित रहते हैं (गीता—ग्यारहवें अध्यायके बावनवें श्लोकमें)।
ऐसे ही जिन महर्षियोंने अनेक ऋचाओंको, मन्त्रोंको,
विद्याओंको, विलक्षण-विलक्षण शक्तियोंको प्रकट किया है, जो संसारसे ऊँचे उठे हुए हैं, जो दिव्य अनुभवसे युक्त हैं, जिनके लिये कुछ करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहा है, ऐसे तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महर्षि लोग भी मेरे प्रकट होनेको अर्थात् मेरे अवतारोंको, अनेक प्रकारकी लीलाओंको, मेरे महत्त्वको पूरा-पूरा नहीं जानते।
यहाँ भगवान्ने देवता और महर्षि—इन दोनोंका नाम लिया है। इसमें ऐसा मालूम देता है कि ऊँचे पदकी दृष्टिसे देवताका नाम और ज्ञानकी दृष्टिसे महर्षिका नाम लिया गया है। इन दोनोंका मेरे प्रकट होनेको न जाननेमें कारण यह है कि मैं देवताओं और महर्षियोंका सब प्रकारसे आदि हूँ—‘अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।’ उनमें जो
१-न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः ॥
परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया। (महाभारत, आश्व० १६।१२-१३)
‘(भगवान् अर्जुनसे बोले—) वह सब-का-सब उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात नहीं है। उस समय योगयुक्त होकर ही मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था।’
२-ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गृह्णाम्युत। (श्रीमद्भग० १।१।८; १०।१३।३)
‘गुरुजन’ अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त-से-गुप्त बात भी बतला दिया करते हैं।’
गृह्णु तत्त्वं न साधु दुरावर्हि। आरत अधिकारी जहं पावर्हि ॥ (मानस, बाल० ११०।१)