श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 699, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
सम्बन्ध—पहले श्लोकमें भगवान्ने जिस परम वचनको सुननेकी आज्ञा दी थी, उसको अब आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥
| बुद्धिः | = बुद्धि, | भवः | = उत्पत्ति, | यशः | = यश |
|---|---|---|---|---|---|
| ज्ञानम् | = ज्ञान, | अभावः | = विनाश, | च | = और |
| असम्मोहः | = असम्मोह, | भयम् | = भय, | अयशः | = अपयश— |
| क्षमा | = क्षमा, | अभयम् | = अभय | भूतानाम् | = प्राणियोंके (ये) |
| सत्यम् | = सत्य, | च | = और | पृथग्विधाः | = अनेक प्रकारके |
| अलग-अलग | |||||
| दमः | = दम, | अहिंसा | = अहिंसा, | भावाः | = (बीस) भाव |
| शमः | = शम | समता | = समता, | मत्तः | = मुझसे |
| एव | = तथा | तुष्टिः | = सन्तोष, | एव | = ही |
| सुखम् | = सुख, | तपः | = तप, | भवन्ति | = होते हैं। |
| दुःखम् | = दुःख, | दानम् | = दान, |
व्याख्या—‘बुद्धिः’ —उद्देश्यको लेकर निश्चय करने वाली वृत्तिका नाम ‘बुद्धि’ है।
‘ज्ञानम्’ —सार-असार, ग्राह्य-अग्राह्य, नित्य-अनित्य, सत्-असत्, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य—ऐसा जो विवेक अर्थात् अलग-अलग जानकारी है, उसका नाम ‘ज्ञान’ है। यह ज्ञान (विवेक) मानवमात्रको भगवान्से मिला है।
‘असम्मोहः’ —शरीर और संसारको उत्पत्ति-विनाशशील जानते हुए भी उनमें ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन करनेका नाम सम्मोह है और इसके न होनेका नाम ‘असम्मोह’ है।
‘क्षमा’ —कोई हमारे प्रति कितना ही बड़ा अपराध करे, अपनी सामर्थ्य रहते हुए भी उसे सह लेना और उस अपराधीको अपनी तथा ईश्वरकी तरफसे यहाँ और परलोकमें कहीं भी दण्ड न मिले—ऐसा विचार करनेका नाम ‘क्षमा’ है।
‘सत्यम्’ —सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिके लिये सत्यभाषण करना अर्थात् जैसा सुना, देखा और समझा है, उसीके अनुसार अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये न ज्यादा, न कम—वैसा-का-वैसा
कह देनेका नाम ‘सत्य’ है।
‘दमः शमः’ —परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखते हुए इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयोंसे हटाकर अपने वशमें करनेका नाम ‘दम’ है, और मनको सांसारिक भोगोंके चिन्तनसे हटानेका नाम ‘शम’ है।
‘सुखं दुःखम्’ —शरीर, मन, इन्द्रियोंके अनुकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो प्रसन्नता होती है, उसका नाम ‘सुख’ है और प्रतिकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो अप्रसन्नता होती है, उसका नाम ‘दुःख’ है।
‘भवोऽभावः’ —सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, भाव आदिके उत्पन्न होनेका नाम ‘भव’ है और इन सबके लीन होनेका नाम ‘अभाव’ है।
‘भयं चाभयमेव च’ —अपने आचरण, भाव आदि शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध होनेसे अन्तःकरणमें अपना अनिष्ट होनेकी जो एक आशंका होती है, उसको ‘भय’ कहते हैं। मनुष्यके आचरण, भाव आदि अच्छे हैं, वह किसीको कष्ट नहीं पहुँचाता, शास्त्र और सन्तोंके सिद्धान्तसे विरुद्ध कोई आचरण नहीं करता, तो उसके हृदयमें अपना अनिष्ट होनेकी आशंका नहीं रहती अर्थात्