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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 704, कुल 1299 में से

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पृष्ठ 704

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

७०३

आदिकी नहीं।

संसारमें क्रिया और पदार्थ निरन्तर परिवर्तनशील हैं। इनमें जो कुछ विशेषता दीखती है, वह स्थायीरूपसे व्यापक परमात्माकी ही है। जहाँ-जहाँ विलक्षणता, अलौकिकता आदि दीखे, वहाँ-वहाँ वस्तु, व्यक्ति आदिकी ही विलक्षणता माननेसे मनुष्य उसीमें उलझ जाता है और मिलता कुछ नहीं। कारण कि वस्तुओंमें जो विलक्षणता दीखती है, वह उस अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्वकी ही झलक है, परिवर्तनशील वस्तुकी नहीं। इस प्रकार उस मूल तत्त्वकी तरफ दृष्टि जाना ही उसे तत्त्वसे जानना अर्थात् श्रद्धासे दृढ़तापूर्वक मानना है।

यहाँ जो विभूतियोंका वर्णन किया गया है, इसका तात्पर्य इनमें परिपूर्णरूपसे व्यापक परमात्माके ऐश्वर्यसे है। विभूतियोंके रूपमें प्रकट होनेवाला मात्र ऐश्वर्य परमात्माका है। वह ऐश्वर्य प्रकट हुआ है परमात्माकी योगशक्तिये। इसलिये जिस-किसीमें जहाँ-कहीं विलक्षणता दिखायी दे, वह विलक्षणता भगवान्की योगशक्तिये प्रकट हुए ऐश्वर्य-(विभूति-) की ही है, न कि उस वस्तुकी। इस प्रकार योग और विभूति परमात्माकी हुई तथा उस योग और

परिशिष्ट भाव —संसारमें जो कुछ विलक्षणता (विशेषता) देखनेमें आती है, वह सब भगवान्का ‘योग’ अर्थात् विलक्षण प्रभाव, सामर्थ्य है। उस विलक्षण प्रभावसे प्रकट होनेवाली विशेषता ‘विभूति’ है—इस प्रकार जो मनुष्य भगवान्की विभूति और योगको तत्त्वसे जान लेता है, उसकी भगवान्में दृढ़ भक्ति हो जाती है। एक भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं—ऐसा सन्देहरहित दृढ़तापूर्वक स्वीकार कर लेना ही तत्त्वसे जानना है। इस प्रकार तत्त्वसे जाननेवालेको भगवान्ने ‘ज्ञानान्’ कहा है (गीता—सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

‘अविकम्प (अविचल) योग’ कहनेका तात्पर्य है कि वह भक्तियोग खुद भी नहीं हिलता और उसको कोई हिला भी नहीं सकता; क्योंकि इसमें एक भगवान्के सिवाय दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है।

जैसे रुप्योंसे सब वस्तुएँ मिल जाती हैं—ऐसा मानकर साधारण मनुष्य रुप्योंको ही महत्व देता है और उसका रुप्योंमें आकर्षण हो जाता है। ऐसे ही जो कुछ प्रभाव, महत्व दीखता है, वह सब भगवान्का ही है—ऐसा जाननेपर मनुष्यकी भगवान्में ही दृढ़ भक्ति हो जाती है।

‘नात्र संशयः’ कहनेका तात्पर्य है कि जब भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता ही नहीं है तो फिर इसमें संशय कैसे हो?

  • भक्तिका प्रकरण होनेसे यहाँ ‘तत्त्वतः वेत्ति’ (तत्त्वतः जानना) का अर्थ ‘तत्त्वतः मानना’ ही लेना चाहिये। कारण कि यहाँ भगवान्ने ‘तत्त्वतः वेत्ति’ का फल अपनेमें दृढ़ भक्ति होना बताया है और आगेके श्लोकमें भी ‘संसारमात्रका मूल कारण मैं ही हूँ और सब संसार मेरेसे ही चेष्टा करता है’ ऐसा मानकर (इति मत्वा) भजन करनेकी बात कही है।

जैसे जानना दृढ़ होता है, ऐसे ही मानना भी दृढ़ होता है अर्थात् दृढ़ मान्यता तत्त्वज्ञानकी तरह ही फल देती है। जैसे, ‘मैं हिन्दू हूँ’ ‘मैं अमुक वर्णवाला हूँ’ आदि मान्यताओंको जबतक स्वयं नहीं छोड़ता, तबतक ये मान्यताएँ छूटती नहीं। इसी तरह ‘इन सब विभूतियोंके मूलमें भगवान् ही हैं, यह मान्यता कभी मिटती नहीं। वर्ण, सम्प्रदाय आदिकी मान्यता सच्ची नहीं है, प्रत्युत शरीरको लेकर होनेसे प्राकृत है और मिटनेवाली है। परन्तु सबके मूलमें परमात्मा है’ यह मान्यता सच्ची है, वास्तविक है। अतः यह मान्यता कभी मिटती नहीं, प्रत्युत ज्ञान (तत्त्वसे जानना) में परिणत होकर ज्ञानस्वरूप हो जाती है।

विभूतिको तत्त्वसे जाननेका तात्पर्य यह हुआ कि उसमें विलक्षणता परमात्माकी है। अतः द्रष्टाकी दृष्टि केवल उस परमात्माकी तरफ ही जानी चाहिये। यही इनको तत्त्वसे जानना अर्थात् मानना है।*

‘सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते’ —उसकी मेरेमें दृढ़ भक्ति हो जाती है। दृढ़ कहनेका तात्पर्य है कि उसकी मेरे सिवाय कहीं भी किंचिन्मात्र भी महत्त्वबुद्धि नहीं होती। अतः उसका आकर्षण दूसरेमें न होकर एक मेरेमें ही होता है।

‘नात्र संशयः’ —इसमें कोई संदेहकी बात नहीं—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि अगर उसको कहीं भी किंचिन्मात्र भी संदेह होता है तो उसने मेरेको तत्त्वसे नहीं माना है। कारण कि उसने मेरे योगको अर्थात् विलक्षण प्रभावको और उससे उत्पन्न होनेवाली विभूतियोंको (ऐश्वर्यको) मेरेसे अलग मानकर महत्व दिया है।

मेरेको तत्त्वसे जान लेनेके बाद उसके सामने लौकिक दृष्टिये किसी तरहकी विलक्षणता आ जाय, तो वह उसपर प्रभाव नहीं डाल सकेगी। उसकी दृष्टि उस विलक्षणताकी तरफ न जाकर मेरी तरफ ही जायगी। अतः उसकी मेरेमें स्वाभाविक ही दृढ़ भक्ति होती है।