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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 707

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १०

‘मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च’ (१५।१५)

‘मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) होता है।’

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें उन भक्तोंका भजन किस रीतिसे होता है—यह बताते हैं।

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ ९॥

मच्चित्ताः = मुझमें चित्तवाले

मद्गतप्राणाः = मुझमें प्राणोंको अर्पण

करनेवाले

(भक्तजन)

परस्परम् = आपसमें

बोधयन्तः = (मेरे गुण, प्रभाव

आदिको) जनाते

हुए

च = और

कथयन्तः = उनका कथन करते

हुए

नित्यम् = नित्य-निरन्तर

तुष्यन्ति = सन्तुष्ट रहते हैं

च = और

माम् = मुझमें

च = ही

रमन्ति = प्रेम

करते हैं।

व्याख्या—[इस श्लोकमें छ: बातें हैं। उनमेंसे

‘मच्चित्ताः’ और ‘मद्गतप्राणाः’ ये दो बातें स्वयं

करनेकी हैं अर्थात् भक्त स्वयं स्वतन्त्रतापूर्वक ऐसे बन जाते

हैं, ‘बोधयन्तः’ और ‘कथयन्तः’—ये दो बातें आपसमें

मिलनेपर होती हैं तथा ‘तुष्यन्ति और रमन्ति’—ये दो

बातें फलरूपमें होती हैं।

भगवान्से ही सब उत्पन्न हुए हैं और भगवान्से ही

सबकी चेष्टा हो रही है अर्थात् सबके मूलमें परमात्मा है—

यह बात जिनको दृढ़तासे और निःसन्देहपूर्वक जँच गयी

है, उनके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी

नहीं रहता। बस, उनका एक ही काम रहता है—सब

प्रकारसे भगवान्में ही लगे रहना। यही बात इस श्लोकमें

बतायी गयी है।]

‘मच्चित्ताः’—वे मेरेमें चित्तवाले हैं। एक स्वयंका

भगवान्में लगना होता है और एक चित्तको भगवान्में

लगाना होता है। जहाँ ‘मैं भगवान्का हूँ’ ऐसे स्वयं

भगवान्में लग जाता है, वहाँ चित्त, बुद्धि आदि सब स्वतः

भगवान्में लग जाते हैं। कारण कि कर्ता-(स्वयं-) के

लगनेपर करण (मन, बुद्धि आदि) अलग थोड़े ही रहेंगे!

वे भी लग जायँगे। करणोंके लगनेपर तो कर्ता अलग रह

सकता है, पर कर्ताके लगनेपर करण अलग नहीं रह

सकते। जहाँ कर्ता रहेगा, वहीं करण भी रहेंगे। कारण कि

करण कर्ताके ही अधीन होते हैं। कर्ता स्वयं जहाँ लगता

है, करण भी वहीं लगते हैं। जैसे, कोई मनुष्य परमात्माप्राप्तिके

लिये सच्चे हृदयसे साधक बन जाता है, तो साधनमें उसका

मन स्वतः लगता है। उसका मन साधनके सिवाय अन्य

किसी कार्यमें नहीं लगता और जिस कार्यमें लगता है, वह

कार्य भगवान्का ही होता है। कारण कि स्वयं कर्ताके

विपरीत मन-बुद्धि आदि नहीं चलते। परन्तु जहाँ स्वयं

भगवान्में नहीं लगता, प्रत्युत ‘मैं तो संसारी हूँ’, ‘मैं तो

गृहस्थ हूँ’—इस प्रकार स्वयंको संसारमें लगाकर चित्तको

भगवान्में लगाना चाहता है, उसका चित्त भगवान्में निरन्तर

नहीं लगता। तात्पर्य है कि स्वयं तो संसारी बने रहे और

चित्तको भगवान्में लगाना चाहे, तो भगवान्में चित्त लगना

असम्भव-सा है।

दूसरी बात, चित्त वहीं लगता है, जहाँ प्रियता होती

है। प्रियता वहीं होती है, जहाँ अपनापन होता है, आत्मीयता

होती है। अपनापन होता है—भगवान्के साथ स्वयंका

सम्बन्ध जोड़नेसे। ‘मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल

भगवान् ही मेरे हैं, शरीर-संसार मेरा नहीं है। मेरेपर प्रभुका

पूरा अधिकार है, इसलिये वे मेरे प्रति चाहे जैसा बर्ताव

या विधान कर सकते हैं। परन्तु मेरा प्रभुपर कोई अधिकार

नहीं है अर्थात् वे मेरे हैं तो मैं जैसा चाहूँ, वे वैसा ही करें—

ऐसा कोई अधिकार नहीं है’—इस प्रकार जो स्वयंको

भगवान्का मान लेता है, अपने-आपको भगवान्के अर्पित

कर देता है, उसका चित्त स्वतः भगवान्में लग जाता है।

ऐसे भक्तोंको ही यहाँ ‘मच्चित्ताः’ कहा गया है।

यहाँ ‘मच्चित्ताः’ पदमें चित्तके अन्तर्गत ही मन है

अर्थात् मनोवृत्ति अलग नहीं है। गीतामें चित्त और मनको

एक भी कहा है और अलग-अलग भी; जैसे ‘भूमिरापोऽनलो

वायु: खं मनो बुद्धिरैव च’ (७।४)—यहाँ मनके

अन्तर्गत ही चित्त है और ‘मन: संयम्य मच्चित्त:’