श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
‘नित्यं तुष्यन्ति च’—इस तरह भगवान्की कथा, लीला, गुण, प्रभाव, रहस्य आदिको आपसमें एक-दूसरेको जानते हुए और उनका ही कथन तथा चिन्तन करते हुए वे भक्त नित्य-निरन्तर सन्तुष्ट रहते हैं। तात्पर्य है कि उनकी सन्तुष्टिका कारण भगवान्के सिवाय दूसरा कोई नहीं रहता, केवल भगवान् ही रहते हैं।
‘रमन्ति च’—वे भगवान्में ही रमण अर्थात् प्रेम करते हैं। इस प्रेममें उनमें और भगवान्में भेद नहीं रहता—
परिशिष्ट भाव —यहाँ भगवान् सातवें श्लोकमें वर्णित अविचल भक्तियोगका वर्णन करते हैं। भगवान्के भक्तोंका चित्त एक भगवान्को छोड़कर कहीं नहीं जाता। उनकी दृष्टिमें जब एक भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं तो फिर उनका चित्त कहाँ जायगा, कैसे जायगा और क्यों जायगा? वे भक्त भगवान्के लिये ही जीते हैं और उनकी सम्पूर्ण चेष्टाएँ भी भगवान्के लिये ही होती हैं। कोई सुननेवाला आ जाय तो वे भगवान्के गुण, प्रभाव आदिकी विलक्षण बातोंका ज्ञान कराते हैं, भगवान्की कथा-लीलाका वर्णन करते हैं और कोई सुनानेवाला आ जाय तो प्रेमपूर्वक सुनते हैं। न तो कहनेवाला तृप्त होता है और न सुननेवाला ही तृप्त होता है! तृप्ति नहीं होती—यह वियोग है और नित नया रस मिलता है—यह योग है। इस वियोग और योगके कारण प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है। नारदभक्तिसूत्रमें आया है—
कण्ठावरोधरोमांचाश्रुभिः परस्परं लपमानाः पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च ॥६८॥
‘ऐसे अनन्य भक्त कण्ठावरोध, रोमांच और अश्रुयुक्त नेत्रवाले होकर परस्पर सम्भाषण करते हुए अपने कुलोंको और पृथ्वीको पवित्र कर देते हैं।’
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भक्तोंके द्वारा होनेवाले भजनका प्रकार बताकर अब आगेके दो श्लोकोंमें भगवान् उनपर विशेष कृपा करनेकी बात बताते हैं।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥
| तेषाम् | = उन | भजताम् | = (मेरा) भजन | येन | = जिससे |
|---|---|---|---|---|---|
| सतत- | करनेवाले भक्तोंको | ते | = उनको | ||
| युक्तानाम् | = नित्य-निरन्तर मुझमें | तम् | = (मैं) वह | माम् | = मेरी |
| लगे हुए (और) | बुद्धियोगम् | = बुद्धियोग | उपयान्ति | = प्राप्ति हो | |
| प्रीतिपूर्वकम् | = प्रेमपूर्वक | ददामि | = देता हूँ, | जाती है। |
व्याख्या —[ भगवनिष्ठ भक्त भगवान्को छोड़कर न तो समता चाहते हैं, न तत्त्वज्ञान चाहते हैं तथा न और ही कुछ चाहते हैं। उनका तो एक ही काम है—हरदम भगवान्में लगे रहना। भगवान्में लगे रहनेके सिवाय उनके लिये और कोई काम ही नहीं है। अब सारा-का-सारा काम, सारी
जिम्मेवारी भगवान्की ही है अर्थात् उन भक्तोंसे जो कुछ कराना है, उनको जो कुछ देना है आदि सब काम भगवान्का ही रह जाता है। इसलिये भगवान् यहाँ (दो श्लोकोंमें) उन भक्तोंको समता और तत्त्वज्ञान देनेकी बात कह रहे हैं। ]
१-‘एवं स्वभक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान्।’ (श्रीमद्भा० १०।८६।५९)
२-न पारमेष्ट्यं न महेन्द्रधियन्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा मव्यर्पितात्मेच्छति मद्भिनान्यत् ॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१४)
‘स्वयंको मेरे अर्पित करनेवाला भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्माका पद, इन्द्रका पद, सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य, पातालादि लोकोंका राज्य, योगकी समस्त सिद्धियाँ और मोक्षको भी नहीं चाहता।’