श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 713, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
सम्बन्ध—भक्तोंपर भगवान्की अलौकिक, विलक्षण कृपाकी बात सुनकर अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की कृपाकी तरफ जाती है और कृपासे प्रभावित होकर वे आगेके चार श्लोकोंमें भगवान्की स्तुति करते हैं।
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १३ ॥
अर्जुन बोले—
| परम् | = परम | पुरुषम् | = पुरुष, | देवलः | = देवल |
|---|---|---|---|---|---|
| ब्रह्म | = ब्रह्म, | आदिदेवम् | = आदिदेव, | तथा | = तथा |
| परम् | = परम | अजम् | = अजन्मा (और) | व्यासः | = व्यास |
| धाम | = धाम | ||||
| (और) | विभुम् | = सर्वव्यापक हैं— | आहुः | = कहते हैं | |
| परमम् | = महान् | त्वाम् | = (ऐसा) आपको | च | = और |
| पवित्रम् | = पवित्र | सर्वे | = सब-के-सब | स्वयम् | = स्वयं |
| आप | |||||
| भवान् | = आप ही हैं। | ऋषयः | = ऋषि, | एव | = भी |
| शाश्वतम् | = (आप) शाश्वत, | देवर्षिः | = देवर्षि, | मे | = मेरे प्रति |
| दिव्यम् | = दिव्य | नारदः | = नारद, | ब्रवीषि | = कहते हैं। |
| असितः | = असित, |
व्याख्या—‘परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्’— अपने सामने बैठे हुए भगवान्की स्तुति करते हुए अर्जुन कहते हैं कि मेरे पूछनेपर जिसको आपने परम ब्रह्म (गीता—आठवें अध्यायका तीसरा श्लोक) कहा है, वह परम ब्रह्म आप ही हैं। जिसमें सब संसार स्थित रहता है, वह परम धाम अर्थात् परम स्थान आप ही हैं (गीता—नवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। जिसको पवित्रोंमें भी पवित्र कहा है—‘पवित्राणां पवित्रं यः’ वह महान् पवित्र
भी आप ही हैं।
‘पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं ’” स्वयं चैव ब्रवीषि मे’—ग्रन्थोंमें ऋषियोंने, देवर्षि नारदने, असित और उनके पुत्र देवल ऋषिने तथा महर्षि व्यासजीने आपको शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु कहा है।
आत्माके रूपमें ‘शाश्वत’ (गीता—दूसरे अध्यायका बीसवाँ श्लोक), सगुण-निराकारके रूपमें ‘दिव्य पुरुष’ (गीता—आठवें अध्यायका दसवाँ श्लोक), देवताओं
१-मार्कण्डेय ऋषिने कहा है—‘श्रीकृष्ण यज्ञोंके यज्ञ, तपोंके तप और भूत-भविष्यत्-वर्तमानरूप हैं।’
(महा०, भीष्म० ६८।३)
भृगु ऋषिने कहा है—‘ये देवताओंके देवता और परम पुरातन विष्णु हैं।’ (महा०, भीष्म० ६८।४)
अंगिरा ऋषिने कहा है—‘ये सम्पूर्ण प्राणियोंकी रचना करनेवाले हैं।’ (महा०, भीष्म० ६८।६)
सनत्कुमार आदिने कहा है—‘इनके मस्तकसे आकाश और भुजाओंसे पृथ्वी व्याप्त है। तीनों लोक इनके उदरमें स्थित हैं। ये सनातन पुरुष हैं। तपसे अन्तःकरण शुद्ध होनेपर ही साधक इन्हें जान सकते हैं। आत्मसाक्षात्कारसे तृप्त हुए ऋषियोंमें भी ये परमोत्कृष्ट हैं। युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले उदार राजर्षियोंकी भी ये ही परमगति हैं।’ (महा०, भीष्म० ६८।८—१०)
२-देवर्षि नारदजीने कहा है—‘भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण लोकोंको उत्पन्न करनेवाले और सम्पूर्ण भावोंको जाननेवाले हैं। ये साध्यों और देवताओंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं।’ (महा०, भीष्म० ६८।९)
३-असित और देवल ऋषिने कहा है—‘भगवान् श्रीकृष्ण ही प्रजाकी सृष्टिमें प्रजापति और सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र रचयिता हैं।’ (महा०, वन० १२।५०)
४-महर्षि व्यासजीने कहा है—‘आप वसुओंके वासुदेव, इन्द्रको इन्द्रत्व देनेवाले और देवताओंके भी परम देवता हैं।’
(महा०, भीष्म० ६८।५)