श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 726, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २७-२८ ] * साधक-संजीवनी * ७२५
किया गया है। यहाँ भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।
‘गन्धर्वाणां चित्ररथः’—स्वर्गके गायकोंको गन्धर्व
कहते हैं और उन सभी गन्धर्वोंमें चित्ररथ मुख्य हैं। अर्जुनके
साथ इनकी मित्रता रही और इनसे ही अर्जुनने गानविद्या
सीखी थी। गानविद्यामें अत्यन्त निपुण और गन्धर्वोंमें मुख्य
होनेसे भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।
‘सिद्धानां कपिलो मुनिः’—सिद्ध दो तरहके होते
हैं—एक तो साधन करके सिद्ध बनते हैं और दूसरे
जन्मजात सिद्ध होते हैं। कपिलजी जन्मजात सिद्ध हैं और
इनको आदिसिद्ध कहा जाता है। ये कर्दमजीके यहाँ
देवहूतिके गर्भसे प्रकट हुए थे। ये सांख्यके आचार्य और
सम्पूर्ण सिद्धोंके गणाधीश हैं। इसलिये भगवान्ने इनको
अपनी विभूति बताया है।
इन सब विभूतियोंमें जो विलक्षणता प्रतीत होती है,
वह मूलतः, तत्त्वतः भगवान्की ही है। अतः साधककी
दृष्टि भगवान्में ही रहनी चाहिये।
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥ २७॥
अश्वानाम् = घोड़ोंमें
अमृतोद्भवम् = अमृतके साथ
समुद्रसे
प्रकट
होनेवाले
उच्चैःश्रवसम् = उच्चैःश्रवा नामक
घोड़ेको,
गजेन्द्राणाम् = श्रेष्ठ हाथियोंमें
ऐरावतम् = ऐरावत नामक
हाथीको
च = और
नराणाम् = मनुष्योंमें
नराधिपम् = राजाको
माम् = मेरी विभूति
विद्धि = मानो।
व्याख्या—‘उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्’—
समुद्रमन्थनके समय प्रकट होनेवाले चौदह रत्नोंमें उच्चैःश्रवा
घोड़ा भी एक रत्न है। यह इन्द्रका वाहन और सम्पूर्ण
घोड़ोंका राजा है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति
बताया है।
‘ऐरावतं गजेन्द्राणाम्’—हाथियोंके समुदायमें जो
श्रेष्ठ होता है, उसको गजेन्द्र कहते हैं। ऐसे गजेन्द्रोंमें भी
ऐरावत हाथी श्रेष्ठ है। उच्चैःश्रवा घोड़ेकी तरह ऐरावत
हाथीकी उत्पत्ति भी समुद्रसे हुई है और यह भी इन्द्रका वाहन
है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।
‘नराणां च नराधिपम्’—सम्पूर्ण प्रजाका पालन,
संरक्षण, शासन करनेवाला होनेसे राजा सम्पूर्ण मनुष्योंमें
श्रेष्ठ है। साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा राजामें भगवान्की
ज्यादा शक्ति रहती है। इसलिये भगवान्ने राजाको अपनी
विभूति बताया है*।
इन विभूतियोंमें जो बलवत्ता, सामर्थ्य है, वह भगवान्से
ही आयी है, अतः उसको भगवान्की ही मानकर
भगवान्का चिन्तन करना चाहिये।
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ २८॥
आयुधानाम् = आयुधोंमें
वज्रम् = वज्र (और)
धेनूनाम् = धेनुओंमें
कामधुक् = कामधेनु
अहम् = मैं
अस्मि = हूँ।
प्रजनः = सन्तान-
उत्पत्तिका
हेतु
कन्दर्पः = कामदेव
अस्मि = मैं हूँ
च = और
सर्पाणाम् = सर्पोंमें
वासुकिः = वासुकि
अस्मि = मैं हूँ।
व्याख्या—‘आयुधानामहं वज्रम्’—जिनसे युद्ध किया
जाता है, उनको आयुध (अस्त्र-शस्त्र) कहते हैं। उन
आयुधोंमें इन्द्रका वज्र मुख्य है। यह दधीचि ऋषिकी
हड्डियोंसे बना हुआ है और इसमें दधीचि ऋषिकी तपस्याका
- यहाँ वर्तमान मन्वन्तरके मनुको भी राजा मान सकते हैं।