श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 728, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३१ ]
- साधक-संजीवनी *
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| दैत्यानाम् | = दैत्योंमें | कालः | = काल | मृगेन्द्रः | = सिंह |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रह्लादः | = प्रह्लाद | अहम् | = मैं | च | = और |
| च | = और | अस्मि | = हूँ | पक्षिणाम् | = पक्षियोंमें |
| कलयताम् | = गणना करनेवालों- | ||||
| (ज्योतिषियों- )में | च | = तथा | वैनतेयः | = गरुड़ | |
| मृगाणाम् | = पशुओंमें | अहम् | = मैं हूँ। |
व्याख्या —‘प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानाम् ’—जो दितिसे उत्पन्न हुए हैं, उनको दैत्य कहते हैं। उन दैत्योंमें प्रह्लादजी मुख्य हैं और श्रेष्ठ हैं। ये भगवान्के परम विश्वासी और निष्काम प्रेमी भक्त हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।
प्रह्लादजी तो बहुत पहले हो चुके थे, पर भगवान्ने ‘दैत्योंमें प्रह्लाद मैं हूँ’ ऐसा वर्तमानका प्रयोग किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान्के भक्त नित्य रहते हैं और श्रद्धा-भक्तिके अनुसार दर्शन भी दे सकते हैं। उनके भगवान्में लीन हो जानेके बाद अगर कोई उनको याद करता है और उनके दर्शन चाहता है, तो उनका रूप धारण करके भगवान् दर्शन देते हैं।
‘कालः कलयतामहम् ’—ज्योतिष-शास्त्रमें काल-(समय-)से ही आयुकी गणना होती है। इसलिये क्षण,
घड़ी, दिन, पक्ष, मास, वर्ष आदि गणना करनेके साधनोंमें काल भगवान्की विभूति है।
‘मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहम् ’—बाघ, हाथी, चीता, रीछ आदि जितने भी पशु हैं, उन सबमें सिंह बलवान्, तेजस्वी, प्रभावशाली, शूरवीर और साहसी है। यह सब पशुओंका राजा है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।
‘वैनतेयश्च पक्षिणाम् ’—विनताके पुत्र गरुड़जी सम्पूर्ण पक्षियोंके राजा हैं और भगवान्के भक्त हैं। ये भगवान् विष्णुके वाहन हैं और जब ये उड़ते हैं, तब इनके पंखोंसे स्वतः सामवेदकी ऋचाएँ ध्वनित होती हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।
इन सब विभूतियोंमें अलग-अलग रूपसे जो मुख्यता बतायी गयी है, वह तत्त्वतः भगवान्की ही है। इसलिये इनकी ओर दृष्टि जाते ही स्वतः भगवान्का चिन्तन होना चाहिये।
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभूतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्तोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥
| पवताम् | = पवित्र करनेवालोंमें | अहम् | = मैं | अस्मि | = मैं हूँ |
|---|---|---|---|---|---|
| पवनः | = वायु | ||||
| (और) | अस्मि | = हूँ। | च | = और | |
| शस्त्रभूताम् | = शस्त्रधारियोंमें | झषाणाम् | = जल- | ||
| जनुओंमें | स्तोतसाम् | = नदियोंमें | |||
| रामः | = राम | मकरः | = मगर | जाह्नवी | = गंगाजी |
| अस्मि | = मैं हूँ। |
व्याख्या —‘पवनः पवतामस्मि ’—वायुसे ही सब चीजें पवित्र होती हैं। वायुसे ही नीरोगता आती है। अतः भगवान्ने पवित्र करनेवालोंमें वायुको अपनी विभूति बताया है।
‘रामः शस्त्रभूतामहम् ’—ऐसे तो राम अवतार हैं, साक्षात् भगवान् हैं, पर जहाँ शस्त्रधारियोंकी गणना होती है, उन सबमें राम श्रेष्ठ हैं। इसलिये भगवान्ने रामको अपनी विभूति बताया है।
‘झषाणां मकरश्चास्मि ’—जल-जनुओंमें मगर सबसे बलवान् है। इसलिये जलचरोंमें मगरको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
‘स्तोतसामस्मि जाह्नवी ’—प्रवाहरूपसे बहनेवाले जितने भी नद, नदी, नाले, झरने हैं, उन सबमें गंगाजी श्रेष्ठ हैं। ये भगवान्की खास चरणोदक हैं। गंगाजी अपने दर्शन, स्पर्श आदिसे दुनियाका उद्धार करनेवाली हैं। मेरे हुए मनुष्योंकी अस्थियाँ गंगाजीमें डालनेसे उनकी सदगति हो जाती है। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।
वास्तवमें इन विभूतियोंकी मुख्यता न मानकर भगवान्की ही मुख्यता माननी चाहिये। कारण कि इन सबमें जो विशेषता-महत्ता देखनेमें आती है, वह भगवान्से ही आयी है।
सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनके दो प्रश्न थे—पहला, भगवान्को जाननेका (मैं आपको कैसे जानूँ) और दूसरा,