श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 741, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
जगह—चौबीसवें और सताईसवें श्लोकमें ‘विद्धि’ तथा यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें ‘अवगच्छ’ पदका प्रयोग करके ‘जानने’ की बात कही है।
‘अस्मि’ (मैं हूँ) पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य विभूतियोंके मूल तत्त्वका लक्ष्य करानेमें है कि इन सब विभूतियोंके मूलमें मैं ही हूँ। कारण कि सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि मैं आपको कैसे जानूँ, तो भगवान्ने ‘अस्मि’ का प्रयोग करके सब विभूतियोंमें अपनेको जाननेकी बात कही।
दो जगह ‘विद्धि’ पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य मनुष्यको सावधान, सावचेत करानेमें है। मनुष्य दोके द्वारा सावचेत होता है—जानके द्वारा और शासनके द्वारा। ज्ञान गुरुके द्वारा प्राप्त होता है और शासन स्वयं राजा करता है। अतः चौबीसवें श्लोकमें जहाँ गुरु बृहस्पतिका वर्णन आया है, वहाँ ‘विद्धि’ कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग गुरुके द्वारा मेरी विभूतियोंके तत्त्वको ठीक तरहसे समझो। विभूतियोंके तत्त्वको समझनेका फल है—मेरेमें दृढ़ भक्ति होना (गीता—इसी अध्यायका सातवाँ श्लोक)। सताईसवें श्लोकमें जहाँ राजाका वर्णन आया है, वहाँ ‘विद्धि’ कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग राजाके शासनद्वारा उन्मागसे बचकर सम्मार्गमें लगना अर्थात् अपना जीवन शुद्ध बनाना
परिशिष्ट भाव —पहले कही गयी विभूतियोंके सिवाय भी साधकको स्वतः जिस-जिसमें व्यक्तिगत आकर्षण दीखता है, वहाँ-वहाँ भगवान्को ही देखना चाहिये अर्थात् वह विशेषता भगवान्की ही है—ऐसा दृढ़तासे धारण कर लेना चाहिये। भगवद्वुद्धि की दृढ़ता होनेसे संसार लुप्त हो जायगा; जैसे—सोनेके गहनोंमें सोनाबुद्धि होनेसे गहने लुप्त हो जाते हैं, खाँड़के खिलीनोंमें खाँड़बुद्धि होनेसे खिलीने लुप्त हो जाते हैं। कारण कि वास्तवमें संसार है नहीं। केवल जीवने ही अपने राग-द्वेषसे संसारको धारण कर रखा है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। सार बात यह है कि किसी भी तरह साधकको अन्तमें ‘वासुदेवः सर्वम्’ (सब कुछ भगवान् ही हैं) में ही पहुँचना है। इसीलिये भगवान्ने अरुन्धतीन्यायसे ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करानेके लिये ही विभूतियोंका वर्णन किया है; क्योंकि विभूतियोंमें भगवान्को देखनेसे फिर सब जगह भगवान् दीखने लग जायेंगे अर्थात् वस्तुरूपसे आकर्षण न रहकर भगवद्रूपसे आकर्षण हो जायगा।
मनुष्यमें जो भी विशेषता, विलक्षणता आती है, वह सब वास्तवमें भगवान्से ही आती है। अगर भगवान्में विशेषता, विलक्षणता न होती तो वह मनुष्यमें कैसे आती? जो चीज अंशोंमें नहीं है, वह अंशमें कैसे आ सकती है? मनुष्यसे यही भूल होती है कि वह उस विशेषताको अपनी विशेषता मानकर अभिमान कर लेता है और जहाँसे वह विशेषता आयी है, उस तरफ खयाल करता ही नहीं।
सृष्टिकी प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति आदि प्रतिक्षण नाशकी ओर जा रहे हैं। हम जिस वस्तु, व्यक्ति आदिमें सुन्दरता, बलवत्ता आदि विशेषता देखते हैं, वे एक दिन नष्ट हो जाते हैं। अतः सृष्टिकी प्रत्येक वस्तु मानो यह क्रियात्मक उपदेश दे रही है कि मेरी तरफ मत देखो, मैं तो रहूँगी नहीं, मेरेको बनानेवाले और बननेवालेकी तरफ देखो। मेरेमें जो सुन्दरता, सामर्थ्य, विलक्षणता आदि दीख रही है, यह मेरी नहीं है, प्रत्युत उसकी है! ऐसा जान लेनेपर फिर वस्तु, व्यक्ति आदिमें हमारा आकर्षण नहीं रहेगा और प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति आदिमें भगवान्के ही दर्शन होंगे। ऐसा होनेपर फिर भोग नहीं होगा, प्रत्युत स्वतः योग (भगवान्के साथ नित्य-सम्बन्ध) हो जायगा।
समझो। गुरु प्रेमसे समझाता है और राजा बलसे, भयसे समझाता है। गुरुके समझानेमें उद्धारकी बात मुख्य रहती है और राजाके समझानेमें लौकिक मर्यादाका पालन करनेकी बात मुख्य रहती है।
सताईसवें श्लोकमें जो ‘उच्चैःश्रवा’ और ‘ऐरावत’ का वर्णन आया है, वे दोनों राजाके वैभवके उपलक्षण हैं। कारण कि घोड़े, हाथी आदि राजाके ऐश्वर्य हैं और ऐश्वर्यवान् राजा ही शासन करता है। इसलिये उस श्लोकमें ‘विद्धि’ पदका प्रयोग खास करके राजाके लिये ही किया हुआ मालूम देता है।
यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें जो ‘अवगच्छ’ पद आया है, उसका अर्थ है—वास्तविकतासे समझना कि जो कुछ भी विशेषता दीखती है, वह वस्तुतः भगवान्की ही है।
इस प्रकार दो बार ‘विद्धि’ और एक बार ‘अवगच्छ’ पद देनेका तात्पर्य यह है कि गुरु और राजाके द्वारा समझानेपर भी जबतक मनुष्य स्वयं उनकी बातको वास्तविकतासे नहीं समझेगा, उनकी बातको नहीं मानेगा, तबतक गुरुका ज्ञान और राजाका शासन उसके काम नहीं आयेगा। अन्तमें तो स्वयंको ही मानना पड़ेगा और वही उसके काम आयेगा।