श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 767, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें७६६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ११
भगवान्ने ही उत्कण्ठित किया और अपना विश्वरूप भी दिखाया; क्योंकि संजयकी अपेक्षा भगवान्के तत्त्वको जाननेमें अर्जुन छोटे थे और भगवान्के साथ सखाभाव रखते थे। इसलिये अर्जुनपर भगवान्की कृपा अधिक थी। इस कृपाके कारण अन्तमें अर्जुनका मोह नष्ट हो गया—'नष्टो मोहः ....... त्वत्प्रसादात्' (गीता १८।७३)। इससे सिद्ध होता है कि कृपापात्रका मोह अन्तमें नष्ट हो ही जाता है।
परिशिष्ट भाव—यहाँ आया 'नभःस्पृशम्' पद विराटरूपकी अनन्तताका द्योतक है। अर्जुनकी दृष्टि जहाँतक जाती है, वहाँतक उनको विराटरूप ही दीखता है—'सा काष्ठा सा परा गतिः' (कठ० १।३।११) अर्थात् वह परमात्मा सबकी परम अवधि और परम गति है।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥
ते = आपके, कालानल-सन्निभानि = प्रलयकालकी अग्निके समान, प्रज्वलित = और, दंष्ट्राकरालानि = दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक), मुखानि = मुखोंको, दृष्ट्वा = देखकर, (मुझे), न = न तो, दिशः = दिशाओंका, जाने = ज्ञान हो रहा है, च = और, न = न, शर्म = शान्ति, एव = ही, लभे = मिल रही है। (इसलिये), देवेश = हे देवेश!, जगन्निवास = हे जगन्निवास!, प्रसीद = (आप) प्रसन्न होइये।
व्याख्या—'दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि'—महाप्रलयके समय सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म करनेवाली जो अग्नि प्रकट होती है, उसे संवर्तक अथवा कालाग्नि कहते हैं। उस कालाग्निके समान आपके मुख हैं, जो भयंकर-भयंकर दाढ़ोंके कारण बहुत विकराल हो रहे हैं। उनको देखनेमात्रसे ही बड़ा भय लग रहा है। अगर उनका कार्य देखा जाय तो उसके सामने किसीका टिकना ही मुश्किल है।
'दिशो न जाने न लभे च शर्म'—ऐसे विकराल मुखोंको देखकर मुझे दिशाओंका भी ज्ञान नहीं हो रहा है। इसका तात्पर्य है कि दिशाओंका ज्ञान होता है सूर्यके उदय और अस्त होनेसे। पर वह सूर्य तो आपके नेत्रोंकी जगह है अर्थात् वह तो आपके विराटरूपके अन्तर्गत आ गया है। इसके सिवाय आपके चारों ओर महान् प्रज्वलित प्रकाश-ही-प्रकाश दीख रहा है (ग्यारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक), जिसका न उदय और न अस्त हो रहा है। इसलिये मेरेको दिशाओंका ज्ञान नहीं हो रहा है और विकराल मुखोंको देखकर भयके कारण मैं किसी तरहका सुख और शान्ति भी प्राप्त नहीं कर रहा हूँ।
'प्रसीद देवेश जगन्निवास'—आप सब देवताओंके मालिक हैं और सम्पूर्ण संसार आपमें ही निवास कर रहा है। अतः कोई भी देवता, मनुष्य भयभीत होनेपर आपको ही पुकारेगा! आपके सिवाय और किसको पुकारेगा? तथा और कौन सुनेगा? इसलिये मैं भी आपको पुकारकर कह रहा हूँ कि हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होइये।
भगवान्के विकराल रूपको देखकर अर्जुनको ऐसा लगा कि भगवान् मानो बड़े क्रोधमें आये हुए हैं। इस भावनाको लेकर ही भयभीत अर्जुन भगवान्से प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना कर रहे हैं।
परिशिष्ट भाव—भगवान् तो प्रसन्न होकर ही अर्जुनको अपना विराटरूप दिखा रहे हैं (गीता—इसी अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक), पर उनके रूपकी उग्रताको देखकर अर्जुनको यह वहम हो रहा है कि भगवान् अप्रसन्न हैं। इसलिये वे भगवान्से प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करते हैं।
सम्बन्ध—अब अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें मुख्य-मुख्य योद्धाओंका विराटरूपमें प्रवेश होनेका वर्णन करते हैं।