श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 775, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
हो जाती है।
जब साधक अपना बल मानते हुए साधन करता है, तब अपना बल माननेके कारण उसको बार-बार विफलताका अनुभव होता रहता है और तत्त्वकी प्राप्तिमें देरी लगती है। अगर साधक अपने बलका किंचिन्मात्र भी अभिमान न करे तो सिद्धि तत्काल हो जाती है। कारण कि परमात्मा तो नित्यप्राप्त है ही, केवल अपने पुरुषार्थके अभिमानके कारण ही उनका अनुभव नहीं हो रहा था। इस पुरुषार्थके अभिमानको दूर करनेमें ही 'निमित्तमात्रं भव' पदोंका तात्पर्य है।
कर्मोंमें जो अपने करनेका अभिमान है कि 'मैं करता हूँ तो होता है, अगर मैं नहीं करूँ तो नहीं होगा', यह
केवल अज्ञताके कारण ही अपनेमें आरोपित कर रखा है। अगर मनुष्य अभिमान और फलेच्छाका त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेमें निमित्तमात्र बन जाय, तो उसका उद्धार स्वतःसिद्ध है। कारण कि जो होनेवाला है, वह तो होगा ही, उसको कोई अपनी शक्तिसे रोक नहीं सकता; और जो नहीं होनेवाला है, वह नहीं होगा, उसको कोई अपने बल-बुद्धिसे कर नहीं सकता। अतः सिद्धि-असिद्धिमें सम रहते हुए कर्तव्य-कर्मोंका पालन किया जाय तो मुक्ति स्वतःसिद्ध है। बन्धन, नरकोंकी प्राप्ति, चौरासी लाख योनियोंकी प्राप्ति—ये सभी कृतिसाध्य हैं और मुक्ति, कल्याण, भगवत्प्राप्ति, भगवत्प्रेम आदि सभी स्वतःसिद्ध हैं।
परिशिष्ट भाव—'निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्' —निमित्तमात्र बननेका तात्पर्य यह नहीं है कि नाममात्रके लिये कर्म करो, प्रत्युत इसका तात्पर्य है कि अपनी पूरी-की-पूरी शक्ति लगाओ, पर अपनेको कारण मत मानो अर्थात् अपने उद्योगमें कमी भी मत रखो और अपनेमें अभिमान भी मत करो। भगवान्ने जो कुछ बल, विद्या, योग्यता आदि दी है, वह सब लगानेके लिये दी है; परन्तु अपना पूरा बल आदि लगाकर हम उसको प्राप्त नहीं कर सकते। प्राप्ति तो उनकी कृपासे ही होगी।
भगवान्ने अपनी ओरसे हमारेपर कृपा करनेमें कोई कमी नहीं रखी है। जैसे बछड़ा एक थनसे ही दूध पीता है, पर भगवान्ने गायको चार थन दिये हैं! ऐसे ही भगवान् चारों तरफसे हमारेपर कृपा कर रहे हैं! हमें तो निमित्तमात्र बनना है। अर्जुनके सामने तो युद्ध था, इसलिये भगवान् उनसे कहते हैं कि तुम निमित्तमात्र बनकर युद्ध करो, तुम्हारी विजय होगी। इसी तरह हमारे सामने संसार है; अतः हम भी निमित्तमात्र बनकर साधन करें तो संसारपर हमारी विजय हो जायगी।
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्तान् ॥ ३४ ॥
| द्रोणम् | = द्रोण | तथा | = तथा | जहि | = मारो। |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = और | अन्यान् | मा, व्यथिष्ठाः | = तुम व्यथा मत करो। | |
| भीष्मम् | = भीष्म | अपि | = अन्य सभी | युध्यस्व | = (और) युद्ध करो। |
| च | = तथा | मया | = मेरे द्वारा | रणे | = युद्धमें (तुम निःसन्देह) |
| जयद्रथम् | = जयद्रथ | हतान् | = मारे हुए | सपत्तान् | = वैरियोंको |
| च | = और | योधवीरान् | = शूरवीरोंको | जेतासि | = जीतोगे। |
| कर्णम् | = कर्ण | त्वम् | = तुम |
व्याख्या—'द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् मया हतांस्त्वं जहि' —तुम्हारी दृष्टिमें गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य जितने प्रतिपक्षके नामी शूरवीर हैं, जिनपर विजय करना बड़ा
कठिन काम है*, उन सबकी आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् वे सब कालरूप मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। इसलिये हे अर्जुन! मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मार दो।
भगवान्के द्वारा पूर्वश्लोकमें 'मयैवैते निहताः पूर्वमेव'
- भीष्म, द्रोण और कर्ण अपनी शूरवीरताके कारण संसारमें प्रसिद्ध थे; अतः इनको जीतनेमें कठिनता थी। जयद्रथ तो ऐसा कोई नामी शूरवीर था नहीं, पर उसको एक वरदान था कि 'तुम्हारा सिर कोई पृथ्वीपर गिरा देगा तो उस (सिर गिरानेवाले-) के सिरके सौ टुकड़े हो जायेंगे। इस वरदानके कारण जयद्रथको मारनेमें कठिनता थी।