श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 777, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें७७६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
संजय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताज्जलिवैपमानः किरिटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगदगदं भीतभीतः प्रणाम्य ॥ ३५ ॥
संजय बोले—
| केशवस्य | = भगवान् केशवका | कृताज्जलिः | = हाथ जोड़कर | प्रणाम्य | = प्रणाम |
|---|---|---|---|---|---|
| एतत् | = यह | नमस्कृत्वा | = नमस्कार करके | करके | |
| वचनम् | = वचन | (और) | सगदगदम् | = गदगद वाणीसे | |
| श्रुत्वा | = सुनकर | भीतभीतः | = भयभीत होते हुए | कृष्णम् | = भगवान् |
| वेषमानः | = (भयसे) काँपते हुए | एव | = भी | कृष्णसे | |
| किरीटी | = किरिटीधारी अर्जुन | भूयः | = फिर | आह | = बोले। |
व्याख्या—‘एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताज्जलिवैपमानः किरिटी’—अर्जुन तो पहलेसे भयभीत थे ही, फिर भगवान्ने ‘मैं काल हूँ, सबको खा जाऊँगा’—ऐसा कहकर मानो डरे हुएको और डरा दिया। तात्पर्य है कि ‘कालोऽस्मि’—यहाँसे लेकर ‘मया हतास्त्वं जहि’—यहाँतक भगवान्ने नाश-ही-नाशकी बात बतायी। इसे सुनकर अर्जुन डरके मारे काँपने लगे और हाथ जोड़कर बार-बार नमस्कार करने लगे।
अर्जुनने इन्द्रकी सहायताके लिये जब काल, खंज आदि राक्षसोंको मारा था, तब इन्द्रने प्रसन्न होकर अर्जुनको सूर्यके समान प्रकाशवाला एक दिव्य ‘किरीट’ (मुकुट) दिया था। इसीसे अर्जुनका नाम ‘किरीटी’ पड़ गया*। यहाँ ‘किरीटी’ कहनेका तात्पर्य है कि जिन्होंने बड़े-बड़े राक्षसोंको मारकर इन्द्रकी सहायता की थी, वे अर्जुन भी भगवान्के विराटरूपको देखकर कम्पित हो रहे हैं।
‘नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगदगदं भीतभीतः प्रणाम्य’—काल सबका भक्षण करता है; किसीको भी छोड़ता नहीं। कारण कि यह भगवान्की संहारशक्ति है, जो हरदम संहार करती ही रहती है। इधर अर्जुनने जब भगवान्के अत्युग्र विराटरूपको देखा तो उनको लगा कि भगवान् कालके भी काल—महाकाल हैं। उनके सिवाय दूसरा कोई भी कालसे बचानेवाला नहीं है। इसलिये अर्जुन भयभीत होकर भगवान्को बार-बार प्रणाम करते हैं।
‘भूयः’ कहनेका तात्पर्य है कि पहले पंद्रहवेंसे इकतीसवें श्लोकतक अर्जुनने भगवान्की स्तुति और नमस्कार किया, अब फिर भगवान्की स्तुति और नमस्कार करते हैं।
हर्षसे भी वाणी गदगद होती है और भयसे भी। यहाँ भयका विषय है। अगर अर्जुन बहुत ज्यादा भयभीत होते तो वे बोल ही न सकते। परन्तु अर्जुन गदगद वाणीसे बोलते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वे इतने भयभीत नहीं हैं।
सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकसे अर्जुन भगवान्की स्तुति करना आरम्भ करते हैं।
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६ ॥
अर्जुन बोले—
| हृषीकेश | = हे अन्तर्यामी | लीलाका) कीर्तन | च | = और |
|---|---|---|---|---|
| भगवन्! | करनेसे | अनुरज्यते | = अनुराग-(प्रेम) | |
| तव | = आपके | जगत् | = यह सम्पूर्ण जगत् | को प्राप्त हो |
| प्रकीर्त्या | = (नाम, गुण, | प्रहृष्यति | = हर्षित हो रहा है | रहा है। |
- पुरा शक्रेण मे दत्तं युध्यतो दानवर्षभैः। किरिटं मूर्ध्नि सूर्याभं तेनाहर्मा किरिटिनम् ॥ (महा० विराट० ४४।१७)