श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ५३ ]
- साधक-संजीवनी *
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(लालसा) रखते हैं, फिर उनको दर्शन क्यों नहीं होते? जब कि भगवान् के दर्शनकी नित्य लालसा रहना अनन्य-भक्ति ही है। इसका समाधान यह है कि वास्तवमें देवताओंकी नित्य लालसा अनन्यभक्ति नहीं है।
नित्य लालसा रखनेका तात्पर्य है कि नित्य-निरन्तर एक परमात्माकी ही लालसा लगी रहे और दूसरी कोई लालसा न रहे। ऐसी लालसावाला दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी भगवान् का भक्त हो जाता है और उसे भगवत्प्राप्ति हो जाती है। परन्तु ऐसी अनन्य लालसा देवताओंकी नहीं होती; क्योंकि वे प्रायः भोग भोगनेके लिये ही देवता बने हैं और उनका प्रायः भोग भोगनेका ही उद्देश्य होता है। तो फिर उनकी लालसा कैसी होती है? जैसी लालसा (इच्छा) प्रायः सभी आस्तिक मनुष्योंमें रहती है कि 'हमें भगवान् के दर्शन हो जायँ, हमारा कल्याण हो जाय।' उनकी ऐसी इच्छा तो रहती है, पर भोग और संग्रहकी रुचि ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। तात्पर्य है कि जैसे मार्गमें चलते हुए किसीको मणि मिल जाय, ऐसे ही (गौणतासे) हमारी मुक्ति हो जाय तो अच्छी बात है—इस प्रकार जैसे मनुष्योंमें मुक्तिकी इच्छा गौण होती है, ऐसे ही भगवान् दर्शन दे तो हम भी दर्शन कर लें—इस प्रकार देवताओंमें दर्शनकी इच्छा गौण होती है।
देवतालोग 'हम इतने ऊँचे पदपर हैं, हमारे लोक, शरीर और भोग दिव्य हैं, हम बड़े पुण्यशाली हैं; अतः हमें भगवान् के दर्शन होने चाहिये'—ऐसी कोरी इच्छा ही
परिशिष्ट भाव —यद्यपि देवताओंका शरीर दिव्य होता है, पर भगवान् का शरीर उससे भी विलक्षण होता है। देवताओंका शरीर भौतिक तेजोमय और भगवान् का शरीर चिन्मय होता है। भगवान् का शरीर सत्-चित्-आनन्दमय, नित्य, अलौकिक और अत्यन्त दिव्य होता है। अतः देवता भी भगवान् को देखनेके लिये लालायित रहते हैं। जैसे साधारण लोगोंमें नये-नये स्थान देखनेका शौक रहता है, ऐसे ही देवताओंमें भगवान् को देखनेका शौक है, प्रेम नहीं। तात्पर्य है कि जैसे भक्त प्रेमपूर्वक भगवान् को देखना चाहते हैं, ऐसे देवता नहीं देखना चाहते। इसलिये भगवान् प्रेमी भक्तोंके तो अधीन हैं, पर देवताओंके अधीन नहीं हैं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कही हुई बातको ही भगवान् आगेके श्लोकमें पुष्ट करते हैं।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवँविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
१-मार्गं प्रयाते मणिलाभवन्मे लभेत मोक्षो यदि तर्हि धन्यः।
२-चिदानन्दमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी ॥ (मानस, अयोध्या १२७। ३)
करते हैं, इसलिये उनको कभी दर्शन होंगे नहीं। कारण कि उनमें देवत्व, पद आदिका अभिमान है। अभिमानसे, पद आदिके बलसे भगवान् के दर्शन नहीं हो सकते। इसलिये अर्जुनने दसवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें कहा है कि 'हे भगवान्! आपके प्रकट होनेको देवता और दानव भी नहीं जानते।' इस प्रकार अर्जुनने भगवान् को न जाननेमें देवताओं और दानवोंको एक श्रेणीमें लिया है। इसका तात्पर्य यही है कि जैसे देवताओंके पास वैभव है, ऐसे ही दानवोंके पास विचित्र-विचित्र माया है, सिद्धियाँ हैं, पर उनके बलपर वे भगवान् को नहीं जान सकते। ऐसे ही देवता भगवान् के दर्शनकी लालसा भी रखें, तो भी उनको देवत्व-शक्तिके दर्शन नहीं हो सकते; क्योंकि भगवान् के दर्शनमें देवत्व कारण नहीं है। तात्पर्य है कि भगवान् को न तो देवत्व-शक्तिके देखा जा सकता है और न यज्ञ, तप, दान आदि शुभ-कर्मोंसे ही देखा जा सकता है (इसी अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक)। उनको तो अनन्यभक्तिके ही देखा जा सकता है (चौवनवाँ श्लोक)। अनन्यभक्तिके देवता और मनुष्य—दोनों ही भगवान् को देख सकते हैं।
'देवा अपि' कहनेका तात्पर्य है कि जिन पुण्योंके कारण देवताओंको ऊँचा पद मिला है, ऊँचे (दिव्य) भोग मिले हैं, उन पुण्योंके बलसे, पद आदिके बलसे वे भगवान् के दर्शन नहीं कर सकते। तात्पर्य है कि पुण्यकर्म ऊँचे लोक, ऊँचे भोग तो दे सकते हैं, पर भगवान् के दर्शन करानेकी उनमें सामर्थ्य नहीं है। भगवान् के दर्शनमें यह प्राकृत महत्त्व कुछ भी मूल्य नहीं रखता।