श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 800, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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| तु | = परन्तु | अनन्यया, | द्रष्टुम् | = (साकाररूपसे) | |
|---|---|---|---|---|---|
| परन्तप | = हे शत्रुतापन | भवत्या | = (केवल) अनन्य- | देखनेमें | |
| अर्जुन | = अर्जुन! | भक्तिसे ही | च | = तथा | |
| एवंविधः | = इस प्रकार | तत्त्वेन | = तत्त्वसे | प्रवेष्टुम् | = प्रवेश (प्राप्त) |
| अहम् | = (चतुर्भुजरूप- | ज्ञातुम् | = जाननेमें | करनेमें | |
| वाला) मैं | च | = और | शक्यः | = शक्य हूँ। |
व्याख्या —‘भवत्या त्वनन्यया शक्य अहमेवं-विधोर्जुन’—यहाँ ‘तु’ पद पहले बताये हुए साधनोंसे विलक्षण साधन बतानेके लिये आया है। भगवान् कहते हैं कि ‘हे अर्जुन! तुमने मेरा जैसा शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुजरूप देखा है, वैसा रूपवाला मैं यज्ञ, दान, तप आदिके द्वारा नहीं देखा जा सकता, प्रत्युत अनन्यभक्तिके द्वारा ही देखा जा सकता हूँ।
अनन्यभक्तिका अर्थ है—केवल भगवान्का ही आश्रय हो, सहारा हो, आशा हो, विश्वास हो*। भगवान्के सिवाय किसी योग्यता, बल, बुद्धि आदिका किंचिन्मात्र भी सहारा न हो। इनका अन्तःकरणमें किंचिन्मात्र भी महत्त्व न हो। यह अनन्यभक्ति स्वयंसे ही होती है, मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिके द्वारा नहीं। तात्पर्य है कि केवल स्वयंकी व्याकुलतापूर्वक उत्कण्ठा हो, भगवान्के दर्शन बिना एक क्षण भी चैन न पड़े। ऐसी जो भीतरमें स्वयंकी बेचैनी है, वही भगवत्प्राप्तिमें खास कारण है। इस बेचैनीमें, व्याकुलतामें अनन्त जन्मोंके अनन्त पाप भस्म हो जाते हैं। ऐसी अनन्यभक्तिवालोंके लिये ही भगवान्ने कहा है—‘जो अनन्यचित्वाला भक्त नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करता है, उसके लिये मैं सुलभ हूँ’ (गीता—आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); और ‘जो अनन्यभक्त मेरा चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
अनन्यभक्तिका दूसरा तात्पर्य यह है कि अपनेमें भजन-स्मरण करनेका, साधन करनेका, उत्कण्ठापूर्वक पुकारनेका जो कुछ सहारा है, वह सहारा किंचिन्मात्र भी न हो। फिर साधन किसलिये करना है? केवल अपना अभिमान मिटानेके लिये अर्थात् अपनेमें जो साधन करनेके बलका भान होता है, कि साधनके बलपर मैं अपना उद्धार
कर लूँगा, उसको मिटानेके लिये ही साधन करना है। तात्पर्य है कि भगवान्की प्राप्ति साधन करनेसे नहीं होती, प्रत्युत साधनका अभिमान गलनेसे होती है। साधनका अभिमान गल जानेसे साधकपर भगवान्की शुद्ध कृपा असर करती है अर्थात् उस कृपाके आनेमें कोई आड़ नहीं रहती और (उस कृपासे) भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।
‘ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुम्’—ऐसी अनन्यभक्तिसे ही मैं तत्त्वसे जाना जा सकता हूँ, अनन्यभक्तिसे ही मैं देखा जा सकता हूँ और अनन्यभक्तिसे ही मैं प्राप्त किया जा सकता हूँ।
ज्ञानके द्वारा भी भगवान् तत्त्वसे जाने जा सकते हैं और प्राप्त किये जा सकते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका पचपनवाँ श्लोक), पर दर्शन देनेके लिये भगवान् बाध्य नहीं हैं।
‘ज्ञातुम्’ कहनेका तात्पर्य है कि मैं जैसा हूँ, वैसा-का-वैसा जाननेमें आ जाता हूँ। जाननेमें आनेका यह अर्थ नहीं है कि मैं उसकी बुद्धिके अन्तर्गत आ जाता हूँ, प्रत्युत उसकी जाननेकी शक्ति मेरेसे परिपूर्ण हो जाती है। तात्पर्य है कि वह मेरेको ‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।११) और ‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९।११)— इस तरह वास्तविक तत्त्वसे जान लेता है।
‘द्रष्टुम्’ कहनेका तात्पर्य है कि वह सगुणरूपसे अर्थात् विष्णु, राम, कृष्ण आदि जिस किसी भी रूपसे देखना चाहे, मेरेको देख सकता है।
‘प्रवेष्टुम्’ कहनेका तात्पर्य है कि वह भगवान्के साथ अपने-आपकी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है अथवा उसका भगवान्की नित्यलीलामें प्रवेश हो जाता है। नित्यलीलामें प्रवेश होनेमें भक्तकी इच्छा और भगवान्की मरजी ही मुख्य होती है। यद्यपि भगवान्के सर्वथा शरण
- (१) एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥ (दोहावली २७७)
(२) एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥ (मानस ३।१०।४)