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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 810

श्लोक ३-४ ]

  • साधक-संजीवनी *

८०९

कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दोनों लौकिक निष्ठाएँ हैं; (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक) परन्तु भक्तियोग लौकिक निष्ठा अर्थात् प्राणीकी निष्ठा नहीं है। जो भगवान्में लग जाता है, वह भगवन्निष्ठ होता है अर्थात् उसकी निष्ठा अलौकिक होती है। उसके साधन और साध्य—दोनों भगवान् ही होते हैं। इसलिये भक्तियोग साधन भी है और साध्य भी, तभी कहा है—‘भक्त्या संजातया भक्त्या ’ (श्रीमद्भ्ग० ११।३।३१) अर्थात् भक्तिसे भक्ति पैदा होती है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—यह नौ प्रकारकी ‘साधन भक्ति’ है* और इससे आगे प्रेमलक्षणा भक्ति ‘साध्य भक्ति’ है, जो कर्मयोग और ज्ञानयोग सबकी साध्य है (गीता—अठारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)। यह साध्य भक्ति ही सर्वोपरि प्रापणीय तत्त्व है।

ज्ञानयोगमें साधक सत्-असत्के विवेकको महत्त्व देकर असत्का त्याग करता है। असत्का त्याग करनेसे त्यागीकी और त्याज्य वस्तुकी सत्ता भावरूपसे बहुत दूरतक साथ रहती है, इसलिये ज्ञानयोगमें असत्का सर्वथा त्याग बहुत देरीसे होता है। कर्मयोगमें साधक असत् वस्तुओंको त्याज्य न मानकर सेवा-सामग्री मानता है। त्याग करनेमें निकृष्ट वस्तु तो सुगमतासे छूटती है, पर अच्छी वस्तुको छोड़ना कठिन होता है। अतः अच्छी वस्तुका त्याग करनेकी अपेक्षा उसको दूसरेकी सेवामें लगाना सुगम पड़ता है। निष्कामभावपूर्वक दूसरोंकी सेवामें लगानेसे असत्का त्याग सुगमतासे और जल्दी हो जाता है। भक्तियोगमें जगत्को भगवान्का अथवा भगवत्स्वरूप माननेसे जगत् (असत्) बहुत शीघ्र लुप्त हो जाता है और भगवान् रह जाते हैं। इस प्रकार ज्ञानयोगकी अपेक्षा कर्मयोगमें असत् (जड़ता)—का शीघ्र त्याग होता है और कर्मयोगकी अपेक्षा भक्तियोगमें असत्का शीघ्र त्याग होता है; क्योंकि भक्तिमें असत् रहता ही नहीं—‘सदसच्चाहम् ’ (गीता ९।१९)। अतः ज्ञानयोगसे कर्मयोग श्रेष्ठ है—‘तयोस्तु कर्मसन्त्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ’ (गीता ५।२) और कर्मयोगसे भक्तियोग श्रेष्ठ है—‘योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावाभजते यो मां स मे युक्ततमो मतः। ’ (गीता ६।४७)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सगुण-उपासकोंको सर्वश्रेष्ठ योगी बताया। इसपर यह प्रश्न हो सकता है कि क्या निर्गुण-उपासक सर्वश्रेष्ठ योगी नहीं हैं? इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं।

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥

तु= औरकूटस्थम्= निर्विकार,सर्वभूतहिते= प्राणिमात्रके
ये= जो (अपने)अचलम्= अचल,हितमें
इन्द्रियग्रामम्= इन्द्रिय-समूहकोध्रुवम्= ध्रुव,रताः= प्रीति रखनेवाले
सन्नियम्य= भलीभाँति वशमें
करकेअक्षरम्= अक्षर(और)
अचिन्त्यम्= चिन्तनमें न आनेवाले,= औरसर्वत्र= सब जगह
सर्वत्रगम्= सब जगह परिपूर्ण,अव्यक्तम्= अव्यक्तकीसमबुद्धयः= समबुद्धिवाले मनुष्य
अनिर्देश्यम्= देखनेमें न
आनेवाले,पर्युपासते= तत्परतासे
उपासना करते हैं,माम्= मुझे
ते= वेएव= ही
प्राप्नुवन्ति= प्राप्त होते हैं।

‘बोधसे पहलेका द्वैत मोहमें डालता है, पर बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत-अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है।’

  • श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

(श्रीमद्भ्ग० ७।५।२३)