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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक ३-४]

  • साधक-संजीवनी *

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और कर्मोंमें वासना तथा अहंभावका अभाव तथा भावरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मामें अभिनभावसे नित्य-निरन्तर दृढ़ स्थित रहना ही उपासना करना है।

इन श्लोकोंमें आठ विशेषणोंसे जिस विशेष वस्तु-तत्त्वका लक्ष्य कराया गया है और उससे जो विशेष वस्तु समझमें आती है, वह बुद्धिविशिष्ट ब्रह्मका ही स्वरूप है, जो कि पूर्ण नहीं है; क्योंकि (लक्षण और विशेषणोंसे रहित) निर्गुण-निर्विशेष ब्रह्मका स्वरूप (जो बुद्धिसे अतीत है) किसी भी प्रकारसे पूर्णतया बुद्धि आदिका विषय नहीं हो सकता। हाँ, इन विशेषणोंका लक्ष्य रखकर जो उपासना की जाती है, वह निर्गुण ब्रह्मकी ही उपासना है और इसके परिणाममें प्राप्ति भी निर्गुण ब्रह्मकी ही होती है।

विशेष बात

परमात्माको तत्त्वसे समझानेके लिये दो प्रकारके विशेषण दिये जाते हैं—निषेधात्मक और विध्यात्मक। परमात्माके अक्षर, अनिर्देश्य, अत्युक्त, अचिन्त्य, अचल, अव्यय, असीम, अपार, अविनाशी आदि विशेषण ‘निषेधात्मक’ हैं और सर्वव्यापी, कूटस्थ, ध्रुव, सत्, चित्, आनन्द आदि विशेषण ‘विध्यात्मक’ हैं। परमात्माके निषेधात्मक विशेषणोंका तात्पर्य प्रकृतिसे परमात्माकी ‘असंगता’ बताना है और विध्यात्मक विशेषणोंका तात्पर्य परमात्माकी स्वतन्त्र ‘सत्ता’ बताना है।

परमात्मतत्त्व सांसारिक प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंसे परे (सहज निवृत्त) और दोनोंको समानरूपसे प्रकाशित करनेवाला है। ऐसे निरपेक्ष परमात्मतत्त्वका लक्ष्य करानेके लिये और बुद्धिको परमात्माके नजदीक पहुँचानेके लिये ही भिन्न-भिन्न विशेषणोंसे परमात्माका वर्णन (लक्ष्य) किया जाता है।

गीतामें परमात्मा और जीवात्माके स्वरूपका वर्णन प्रायः समान ही मिलता है। परमात्माके लिये यहाँ जो विशेषण दिये गये हैं, वही विशेषण गीतामें जीवात्माके लिये भी दिये गये हैं; जैसे—दूसरे अध्यायके चौबीसवें-पचीसवें श्लोकोंमें ‘सर्वगतः’, ‘अचलः’, ‘अव्यक्तः’, ‘अचिन्त्यः’ आदि और पन्द्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें ‘कूटस्थः’ एवं ‘अक्षरः’ विशेषण जीवात्माके लिये आये हैं। इसी प्रकार सातवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें ‘अव्ययम्’ विशेषण परमात्माके लिये और चौदहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘अव्ययम्’ विशेषण

जीवात्माके लिये आया है।

संसारमें व्यापकरूपसे भी परमात्मा और जीवात्माको समान बताया गया है; जैसे—आठवें अध्यायके बाईसवें तथा अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें ‘येन सर्वमिदं तत्म्’ पदोंसे और नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘मया तत्मिदं सर्वम्’ पदोंसे परमात्माको सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त बताया गया है। इसी प्रकार दूसरे अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘येन सर्वमिदं तत्म्’ पदोंसे जीवात्माको भी सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त बताया गया है।

जैसे नेत्रोंकी दृष्टि आपसमें नहीं टकराती अथवा व्यापक होनेपर भी शब्द परस्पर नहीं टकराते। ऐसे ही (द्वैतमतके अनुसार) सम्पूर्ण जगत्में समानरूपसे व्याप्त होनेपर भी निरवयव होनेसे परमात्मा और जीवात्माकी सर्वव्यापकता आपसमें नहीं टकराती।

‘सर्वभूतहिते रताः’—कर्मयोगके साधनमें आसक्ति, ममता, कामना और स्वार्थके त्यागकी मुख्यता है। मनुष्य जब शरीर, धन, सम्पत्ति आदि पदार्थोंको ‘अपना’ और ‘अपने लिये’ न मानकर उनको दूसरोंकी सेवामें लगाता है; तब उसकी आसक्ति, ममता, कामना और स्वार्थभावका त्याग स्वतः हो जाता है। जिसका उद्देश्य प्राणिमात्रकी सेवा करना ही है, वह अपने शरीर और पदार्थोंको (दीन-दुःखी, अभावग्रस्त) प्राणियोंकी सेवामें लगायेगा ही। शरीरको दूसरोंकी सेवामें लगानेसे ‘अहंता’ और पदार्थोंको दूसरोंकी सेवामें लगानेसे ‘ममता’ नष्ट होती है। साधकका पहलसे ही यह लक्ष्य होता है कि जो पदार्थ सेवामें लग रहे हैं, वे सैक्यके ही हैं। अतः कर्मयोगके साधनमें सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिये ‘सर्वभूतहिते रताः’ पदका प्रयोग कर्मयोगका आचरण करनेवालेके सम्बन्धमें करना ही अधिक युक्तिसंगत है। परन्तु भगवान्ने इस पदका प्रयोग यहाँ तथा पाँचवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें—दोनों ही स्थानोंपर ज्ञानयोगियोंके सम्बन्धमें किया है। इससे यही सिद्ध होता है कि कर्मसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये कर्मयोगकी प्रणालीको अपनानेकी आवश्यकता ज्ञानयोगमें भी है।

एक बात खास ध्यान देनेकी है। शरीर, पदार्थ और क्रियासे जो सेवा की जाती है, वह सीमित ही होती है; क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थ और क्रियाएँ मिलकर भी सीमित ही हैं। परन्तु सेवामें प्राणिमात्रके हितका भाव असीम होनेसे