श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 816, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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मानने लगता है—‘आत्मीयम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन’ (गीता ६।३२), तब उसकी सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें प्रीति हो जाती है। कारण कि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपना ही शरीर माननेसे वह किसीको भी बुरा नहीं समझता, किसीका भी बुरा नहीं चाहता और किसीका भी बुरा नहीं करता। इस प्रकार बुराईका त्याग होनेपर उसके द्वारा स्वतः दूसरोंका हित होता है। इतना ही नहीं, जैसे अपने दाँतोंसे अपनी जीभ कट जाय तो दाँतोंपर क्रोध करके उनको कोई नहीं तोड़ता, ऐसे ही जो सब प्राणियोंको अपना मानता है, उसका कोई बुरा भी करता है, तो भी उसके मनमें उसका बुरा करनेका भाव नहीं आता—‘उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥’ (मानस, सुन्दर० ४१।४)। बुराईका त्याग होनेपर दूसरोंकी जो सेवा होती है, वह बड़े-से-बड़े दान-पुण्यसे भी नहीं हो सकती। इसलिये बुराईका त्याग भलाईका मूल है। जिसने बुराईका त्याग कर दिया है, वही ‘सर्वभूतहिते रताः’ हो सकता है।
सम्बन्ध—अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने दूसरे श्लोकमें सगुण-उपासकोंको सर्वश्रेष्ठ बताया और तीसरे-चौथे श्लोकोंमें निर्गुण-उपासकोंको अपनी प्राप्तिकी बात कही। अब दोनों प्रकारकी उपासनाओंके अवान्तर भेद तथा कठिनाई एवं सुगमताका वर्णन आगेके तीन श्लोकोंमें करते हैं।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्धिरवाप्यते ॥५॥
| अव्यक्तासक्त- | क्लेशः | = कष्ट | अव्यक्ता | = अव्यक्त-विषयक |
|---|---|---|---|---|
| चेतसाम् | अधिकतरः | = अधिक होता है; | गतिः | = गति |
| चित्वाले | हि | = क्योंकि | दुःखम् | = कठिनातसे |
| तेषाम् | देहवद्धिः | = देहाभिमानियोंके | अवाप्यते | = प्राप्त की |
| (अपने साधनमें) | द्वारा | जाती है। |
व्याख्या—‘क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्त-चेतसाम्’—अव्यक्तमें आसक्त चित्वाले—इस विशेषणसे यहाँ उन साधकोंकी बात कही गयी है, जो निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ तो मानते हैं, पर जिनका चित्त निर्गुण-तत्त्वमें आविष्ट नहीं हुआ है। तत्त्वमें आविष्ट होनेके लिये साधकमें तीन बातोंकी आवश्यकता होती है—रुचि, विश्वास और योग्यता। शास्त्रों और गुरुजनोंके द्वारा निर्गुण-तत्त्वकी महिमा सुननेसे जिनकी (निराकारमें आसक्त चित्वाला होने और निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ माननेके कारण) उसमें कुछ रुचि तो पैदा हो जाती है और वे विश्वासपूर्वक साधन आरम्भ भी कर देते हैं; परन्तु वैराग्यकी कमी और देहाभिमानके कारण जिनका चित्त तत्त्वमें प्रविष्ट नहीं होता—ऐसे साधकोंके लिये यहाँ ‘अव्यक्तासक्तचेतसाम्’ पदका प्रयोग हुआ है।
भगवान्ने छठे अध्यायके सताईसवें-अट्ठाईसवें श्लोकोंमें बताया है कि ‘ब्रह्मभूत’ अर्थात् ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित साधकको सुखपूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। परन्तु यहाँ इस श्लोकमें ‘क्लेशः अधिकतरः’ पदोंसे यह स्पष्ट किया है कि इन साधकोंका चित्त ब्रह्मभूत साधकोंकी तरह
निर्गुण-तत्त्वमें सर्वथा तल्लीन नहीं हो पाया है। अतः उन्हें अव्यक्तमें ‘आविष्ट’ चित्वाला न कहकर ‘आसक्त’ चित्वाला कहा गया है। तात्पर्य यह है कि इन साधकोंकी आसक्ति तो देहमें होती है, पर अव्यक्तकी महिमा सुनकर वे निर्गुणोपासनाको ही श्रेष्ठ मानकर उसमें आसक्त हो जाते हैं; जबकि आसक्ति देहमें ही हुआ करती है, अव्यक्तमें नहीं।
तेरहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘अव्यक्तम्’ पद प्रकृतिके अर्थमें आया है तथा और भी कई जगह वह प्रकृतिके लिये ही प्रयुक्त हुआ है; परन्तु यहाँ ‘अव्यक्तासक्तचेतसाम्’ पदमें ‘अव्यक्त’ का अर्थ प्रकृति नहीं, प्रत्युत निर्गुण-निराकार ब्रह्म है। कारण यह है कि इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने ‘त्वाम्’ पदसे सगुण-साकार स्वरूपके और ‘अव्यक्तम्’ पदसे निर्गुण-निराकार स्वरूपके विषयमें ही प्रश्न किया है। उपासनाका विषय भी परमात्मा ही है, न कि प्रकृति; क्योंकि प्रकृति और प्रकृतिका कार्य तो त्याज्य है। इसलिये उसी प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने ‘अव्यक्त’ पदका (व्यक्त रूपके विपरीत) निर्गुण-निराकार स्वरूपके अर्थमें ही प्रयोग किया है। अतः यहाँ प्रकृतिका प्रसंग न होनेके कारण ‘अव्यक्त’ पदका अर्थ