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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५), ‘मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ (गीता १५।७)। इसलिये गीतामें ‘मव्यासक्तमनाः’ (७।१) ‘मन्मना भव’ (१।३४, १८।६५), ‘मव्यावेश मनो ये माम्’ (१२।२), ‘मव्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय’ (१२।८), ‘मच्चित्तः सततं भव’ (१८।५७) आदि पदोंमें जो मन लगानेकी बात आयी है, वह वास्तवमें स्वयंको भगवान्में लगानेका ही उपाय है। भगवान्में मन-बुद्धि लगानेसे मन-बुद्धि तो नहीं लगते, पर स्वयं लग जाता है—‘निवसिष्यसि मव्येव’। कारण कि जीवका स्वभाव है कि वह वहीं लगता है, जहाँ उसके मन-बुद्धि लगते हैं। जैसे सुई जहाँ जाती है, धागा वहीं जाता है, ऐसे ही मन-बुद्धि जहाँ जाते हैं, स्वयं वहीं जाता है। संसारको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे मन-बुद्धि संसारमें लग गये और संसारमें मन-बुद्धि लगनेसे जीव स्वयं संसारमें लग गया, इसलिये जीवको संसारसे हटानेके लिये भगवान् मन-बुद्धिको अपनेमें लगानेकी आज्ञा देते हैं। जैसे सुनार सोनेको शुद्ध करनेके लिये उसको अग्निमें तपाता है तो सोनेमें मिला हुआ विजातीय पदार्थ (खोट) अलग हो जाता है और शुद्ध सोना रह जाता है, ऐसे ही भगवान्में लगानेसे मन-बुद्धि अलग हो जाते हैं और स्वयं भगवान्में मिल जाता है अर्थात् केवल भगवान् रह जाते हैं। श्रीमद्भगवतमें भगवान् कहते हैं—

विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते। मामनुस्मरतश्चित्तं मव्येव प्रविलीयते ॥

(११।१४।२७)

विषयोंका चिन्तन करनेसे मन विषयोंमें फँस जाता है और मेरा स्मरण करनेसे मन मेरेमें विलीन हो जाता है अर्थात् मनकी सत्ता रहती ही नहीं।

तात्पर्य है कि भगवान्में लगानेसे मन-बुद्धि भगवान्में लगते नहीं, प्रत्युत लीन हो जाते हैं; क्योंकि मूलमें अपरा प्रकृति भगवान्का ही स्वभाव है। भगवान्में लीन होनेपर मन-बुद्धिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’। दूसरे शब्दोंमें, मन-बुद्धि संसारसे तो हट गये, पर भगवान्को पकड़ सके नहीं, इसलिये उनकी स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं, केवल भगवान् रह जाते हैं।

ज्ञानमें स्वरूप मुख्य है और भक्तिमें भगवान् मुख्य हैं। इसलिये ज्ञानी स्वरूपमें स्थित होता है—‘समदुःखसुरः स्वस्थः’ (गीता १४।२४) और भक्त भगवान्में स्थित होता है—‘निवसिष्यसि मव्येव’। स्वरूपमें स्थित होनेपर अखण्डरसका अनुभव होता है और भगवान्में स्थित होनेपर प्रतिक्षण वर्धमान अनन्तरसका अनुभव होता है। भगवान्में स्थित होनेपर फिर भक्त सब जगह भगवान्को ही देखता है (गीता—छठे अध्यायका तीसवाँ श्लोक); क्योंकि उसका पहलेसे ही यह भाव है कि भगवान् सर्वव्यापी हैं।

इस श्लोकमें यह क्रम बताया गया है कि भगवान्में पहले साधकका मन लगता है, फिर बुद्धि लगती है, फिर स्वयं लगता है। स्वयं लगनेसे अहम् मिट जाता है।

प्रेममें मन लगता है और श्रद्धामें बुद्धि लगती है। भगवान्में मन-बुद्धि लगानेका तात्पर्य है—भगवान्में प्रेम और श्रद्धा होना अर्थात् संसारकी प्रियता और महत्ता न रहकर केवल भगवान्में ही प्रियता और महत्ता हो जाना।

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छापत्तुं धनञ्जय ॥ ९ ॥

अथ= अगर (तू)करनेमेंअभ्यासयोगेन= अभ्यासयोगके
चित्तम्= मनकोन, शक्नोषि= अपनेको समर्थद्वारा (तू)
मयि= मुझमेंनहीं मानता,माम्
स्थिरम्= अचलभावसेततः= तोआप्नुम्
समाधातुम्= स्थिर (अर्पण)धनञ्जय= हे धनंजय!इच्छ

व्याख्या—‘अथ चित्तं समाधातुं ..... मामिच्छापत्तुं’ श्लोकका पीछेके श्लोकमें वर्णित साधनसे सम्बन्ध है, धनंजय—यहाँ ‘चित्तम्’ पदका अर्थ ‘मन’ है। परन्तु इस, इसलिये ‘चित्तम्’ पदसे यहाँ मन और बुद्धि दोनों ही लेना