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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 830

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

८२९

परिशिष्ट भाव —अभ्यासकी अपेक्षा क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करना सुगम है। कारण कि अभ्यास तो नया काम है, जो करना पड़ता है, पर कर्म स्वतः होते हैं; क्योंकि कर्म करनेका स्वभाव पड़ा हुआ है। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्य बँधता है—‘कर्मणा बध्यते जन्तुः ’। इसलिये कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेसे मनुष्य सुगमतापूर्वक भगवान्को प्राप्त हो जाता है (गीता—नवें अध्यायका सताईसवाँ-अठ्ठाईसवाँ श्लोक)।

मदर्थमपि ’ पदका तात्पर्य है कि आरम्भसे भगवान्के लिये ही कर्म किये जायँ।

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥

अथ= अगरसाधन-कोयतात्मवान्= मन-इन्द्रियोंको
मद्योगम्= मेरे योग-अपि= भीवशमें करके
(समता-) केकर्तुम्= करनेमें (अपनेको)सर्वकर्मफल-
आश्रितः= आश्रित हुआअशक्तः= असमर्थत्यागम्= सम्पूर्ण कर्मोंके
(तू)(पाता)फलकी इच्छाका
एतत्= इस-(पूर्वश्लोकमें)असि= है,त्याग
कहे गयेततः= तोकुरु= कर।

व्याख्या —‘अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योग- माश्रितः ’—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने लिये ही सम्पूर्ण कर्म करनेसे अपनी प्राप्ति बतायी और अब इस श्लोकमें वे सम्पूर्ण कर्मोंके फलत्यागरूप साधनकी बात बता रहे हैं। वहाँ भगवान्के लिये समस्त कर्म करनेमें भक्तिकी प्रधानता होनेसे उसे ‘भक्तियोग’ कहेंगे और यहाँ सर्वकर्मफलत्यागमें केवल फलत्यागकी मुख्यता होनेसे इसे ‘कर्मयोग’ कहेंगे। इस प्रकार भगवत्प्राप्तिके ये दोनों ही स्वतन्त्र (पृथक्-पृथक्) साधन हैं।

इस श्लोकमें ‘मद्योगमाश्रितः ’ पदका सम्बन्ध ‘अथैतदप्यशक्तोऽसि ’ के साथ मानना ही ठीक मालूम देता है; क्योंकि यदि इसका सम्बन्ध ‘सर्वकर्मफलत्यागं कुरु ’ के साथ माना जाय, तो भगवान्के आश्रयकी मुख्यता हो जानेसे यहाँ ‘भक्तियोग’ ही हो जायगा। ऐसी दशामें दसवें श्लोकमें कहे हुए भक्तियोगके साधनसे इसकी भिन्नता नहीं रहेगी, जबकि भगवान् दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः ‘भक्तियोग’ और ‘कर्मयोग’—दो भिन्न-भिन्न साधन बताना चाहते हैं।

दूसरी बात, भगवान्ने इस श्लोकमें ‘यतात्मवान् ’ (मन-बुद्धि-इन्द्रियोंके सहित शरीरपर विजय प्राप्त करनेवाला) पद भी दिया है। आत्मसंयमकी विशेष आवश्यकता कर्मयोगमें ही है; क्योंकि आत्मसंयमके बिना सर्वकर्म-फलत्याग होना असम्भव है। इसलिये भी ‘मद्योगमाश्रितः

पदका सम्बन्ध ‘अथैतदप्यशक्तोऽसि ’ के साथ मानना चाहिये, न कि सर्वकर्मफलत्याग करनेकी आज्ञाके साथ।

जिसका भगवान्पर तो उतना विश्वास नहीं है, पर भगवान्के विधानमें अर्थात् देश-समाजकी सेवा आदि करनेमें अधिक विश्वास है, उसके लिये भगवान् इस श्लोकमें सर्वकर्मफलत्याग-रूप साधन बताते हैं। तात्पर्य है कि अगर वह सम्पूर्ण कर्मोंको मेरे अर्पण न कर सके, तो जिस फलको प्राप्त करना उसके हाथकी बात नहीं है, उस फलकी इच्छाका त्याग कर दे—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ’ (गीता २।४७)। फलकी इच्छाका त्याग करके कर्तव्य कर्म करनेसे उसका संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ’—कर्मयोगके साधनमें स्वाभाविक ही कर्मोंका विस्तार होता है; क्योंकि योगकी प्राप्तिमें अनासक्त भावसे कर्म करना ही हेतु कहा गया है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)। इससे कर्मोंमें फलासक्ति होनेके कारण बँधनेका भय रहता है। अतः ‘यतात्मवान् ’ पदसे भगवान् कर्मफलत्यागके साधनमें मन-इन्द्रियों आदिके संयमकी आवश्यकता बताते हैं। यह ध्यान देनेकी बात है कि मन-इन्द्रियोंका संयम होनेपर कर्मफलत्यागमें भी सुगमता होती है। अगर साधक मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिका संयम नहीं करता, तो स्वाभाविक ही उसके मनद्वारा विषयोंका चिन्तन होगा और उसकी उन विषयोंमें आसक्ति हो जायगी। इससे उसका