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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 842, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 842

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

८४९

शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते' (१८।५३) और भक्तियोगमें 'निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी' (१२।१३)। इस विषयमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि वास्तवमें हमारा स्वरूप अहंता-ममतासे रहित है। अहंता (मैंपन) और ममता (मेरापन)—दोनों अपने स्वरूपमें मानी हुई हैं, वास्तविक नहीं हैं। अगर ये वास्तविक होतीं तो हम कभी निर्मम और निरहंकार नहीं हो सकते और भगवान् भी सबके लिये निर्मम और निरहंकार होनेकी बात नहीं कहते। परन्तु हम निर्मम और निरहंकार हो सकते हैं, तभी भगवान् ऐसा कहते हैं।

कर्मयोगमें पहले 'कामना'का त्याग होता है, फिर कर्मयोगी स्वतः निर्मम-निरहंकार हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका इकहत्तरवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगमें पहले 'अहंकार'का त्याग होता है, फिर ज्ञानयोगी स्वतः निर्मम हो जाता है (गीता—अठारहवाँ अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक)। भक्तियोगमें भक्त अपने-आपको भगवान्के अर्पित कर देता है तो भगवत्कृपासे वह स्वतः निर्मम-निरहंकार हो जाता है।

'मव्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः'—यहाँ 'मव्यर्पितमनोबुद्धिः' पद उस मनुष्यका वाचक है, जिसने स्वयंको (अपने-आपको) भगवान्के अर्पित कर दिया है। स्वयं अर्पित होनेसे मन-बुद्धि भी स्वतः भगवान्के अर्पित हो जाते हैं। स्वयं अर्पित होनेसे फिर कुछ बाकी रहता ही नहीं। कारण कि स्वयं पहले है, शरीर-मन-बुद्धि आदि पीछे हैं। भक्त पहले है, मनुष्य पीछे है। भगवान्में अर्पित होनेसे मन-बुद्धिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं।

भगवान्का परा और अपरा दोनों प्रकृतियोंके साथ समान सम्बन्ध है, पर जीव-(परा-) का सम्बन्ध अपराके साथ नहीं है। कारण कि जीव अपरा प्रकृतिसे उत्कृष्ट है और भगवान्का अंश है। इसलिये जीवका सम्बन्ध भगवान्के साथ है। 'मव्यर्पितमनोबुद्धिः' का तात्पर्य है कि जीव अपरा प्रकृति-(मन-बुद्धि-) को अपना न माने, प्रत्युत भगवान्को ही अपना माने*।

भगवान् ज्ञानस्वरूप और नित्य परिपूर्ण हैं। अतः उनमें ज्ञानकी भूख (जिज्ञासा) तो नहीं है, पर प्रेमकी भूख (प्रेम-पिपासा) अवश्य है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है। ऐसे भक्तके सिवाय भगवान्को प्यारा और कोई हो ही नहीं सकता।

जैसे किसी राजाका बेटा दूसरोंसे भीख माँगने लगे तो वह राजाको नहीं सुहाता, ऐसे ही सत्-चित्-आनन्दरूप भगवान्का अंश जीव जब असत्-जड़-दुःखरूप संसारसे कुछ आशा रखता है, तब वह भगवान्को नहीं सुहाता, प्यारा नहीं लगता; क्योंकि इसमें जीवका महान् अहित है। भगवान्को वही प्यारा लगता है, जो अन्यसे आशा नहीं रखता तथा जिसमें जीवका परम हित होता है—

एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाके गति न आन की ॥ (मानस, अरण्य० १०।४)

सम्बन्ध—सिद्ध भक्तके लक्षणोंका दूसरा प्रकरण, जिसमें छः लक्षणोंका वर्णन है, आगेके श्लोकमें आया है।

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥

यस्मात्= जिससेलोकात्= किसी प्राणीसेभय और उद्वेग-
लोकः= कोई भी प्राणीन, उद्विजते= उद्विग्न नहीं होता(हलचल-) से
न, उद्विजते= उद्विग्न (क्षुब्ध)= तथामुक्तः
नहीं होतायः= जो= रहित है,
= औरहर्षामर्ष-सः
यः= जो स्वयं भीभयोद्वेगैः= हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या),मे
प्रियः
= मुझे
= प्रिय है।
  • यहाँ 'मन'के अन्तर्गत चित्तको और बुद्धिके अन्तर्गत अहम्को भी लेना चाहिये।