श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 845, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें८४४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १२
अपनेमें किसी गुणके आनेपर अभिमानरूप दुर्गुण उत्पन्न
हो जाय तो उस गुणको गुण कैसे माना जा सकता है?
दैवी सम्पत्ति (सद्गुण)-से कभी आसुरी सम्पत्ति (दुर्गुण)
उत्पन्न नहीं हो सकती। अगर दैवी सम्पत्तिसे आसुरी
सम्पत्तिकी उत्पत्ति होती तो 'दैवी सम्पद्विमोक्षाय' (गीता
१६। ५)-इन भगवद्वचनोंके अनुसार मनुष्य मुक्त कैसे
होता? वास्तवमें गुणोंके अभिमानमें गुण कम तथा दुर्गुण
(अभिमान) अधिक होता है। अभिमानसे दुर्गुणोंकी वृद्धि
होती है; क्योंकि सभी दुर्गुण-दुराचार अभिमानके ही
आश्रित रहते हैं।
भक्तको तो प्राय: इस बातकी जानकारी ही नहीं
होती कि मेरेमें कोई गुण है। अगर उसको अपनेमें कभी
कोई गुण दीखता भी है तो वह उसको भगवान्का ही
मानता है, अपना नहीं। इस प्रकार गुणोंका अभिमान न
होनेके कारण भक्त सभी दुर्गुण-दुराचारों, विकारोंसे
मुक्त होता है भक्तको भगवान् प्रिय होते हैं, इसलिये
भगवान्को भी भक्त प्रिय होते हैं, (गीता-सातवें अध्यायका
सत्रहवाँ श्लोक)।
परिशिष्ट भाव-दूसरेको सत्ता देनेसे ही उद्वेग, ईर्ष्या, भय आदि होते हैं। भक्तकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय
दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं, फिर वह किससे उद्वेग, ईर्ष्या, भय आदि करे और क्यों करे?-'निज प्रभुमय देखहिं
जगत केहि सन करहिं बिरोध' (मानस, उत्तर० ११२ ख)।
सम्बन्ध-सिद्ध भक्तके छ: लक्षण बतानेवाला तीसरा प्रकरण आगेके श्लोकमें आया है।
अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय: ॥ १६ ॥
य: = जो
अनपेक्ष: = अपेक्षा-
(आवश्यकता-) से
रहित,
शुचि: = (बाहर-भीतरसे)
पवित्र,
दक्ष: = चतुर,
उदासीन: = उदासीन,
गतव्यथ: = व्यथासे रहित (और)
सर्वारम्भ-
परित्यागी = सभी आरम्भोंका
अर्थात् नये-नये
कर्मोंके आरम्भका
सर्वथा त्यागी है,
स: = वह
मद्भक्त: = मेरा भक्त
मे = मुझे
प्रिय: = प्रिय है।
व्याख्या-'अनपेक्ष:'-भक्त भगवान्को ही सर्वश्रेष्ठ
मानता है। उसकी दृष्टिमें भगवत्प्राप्तिसे बढ़कर दूसरा कोई
लाभ नहीं होता। अत: संसारकी किसी भी वस्तुमें उसका
किंचिन्मात्र भी खिंचाव नहीं होता। इतना ही नहीं, अपने
कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धिमें भी उसका
अपनापन नहीं रहता, प्रत्युत वह उनको भी भगवान्का ही
मानता है, जो कि वास्तवमें भगवान्के ही हैं। अत: उसको
शरीर-निर्वाहकी भी चिन्ता नहीं होती। फिर वह और किस
बातकी अपेक्षा करे? अर्थात् फिर उसे किसी भी वस्तुकी
इच्छा-वासना-स्पृहा नहीं रहती।
भक्तपर चाहे कितनी ही बड़ी आपत्ति आ जाय,
आपत्तिका ज्ञान होनेपर भी उसके चित्तपर प्रतिकूल प्रभाव
नहीं होता। भयंकर-से-भयंकर परिस्थितिमें भी वह
भगवान्की लीलाका अनुभव करके मस्त रहता है। इसलिये
वह किसी प्रकारकी अनुकूलताकी कामना नहीं करता।
नाशवान् पदार्थ तो रहते नहीं, उनका वियोग अवश्यम्भावी
है और अविनाशी परमात्मासे कभी वियोग होता ही नहीं-
इस वास्तविकताको जाननेके कारण भक्तमें स्वाभाविक ही
नाशवान् पदार्थोंकी इच्छा पैदा नहीं होती।
यह बात खास ध्यान देनेकी है कि केवल इच्छा
करनेसे शरीर-निर्वाहके पदार्थ मिलते हैं तथा इच्छा न
करनेसे न मिलते हों-ऐसा कोई नियम नहीं है। वास्तवमें
शरीर-निर्वाहके आवश्यक सामग्री स्वत: प्राप्त होती है;
क्योंकि जीवमात्रके शरीर-निर्वाहकी आवश्यक सामग्रीका
प्रबन्ध भगवान्की ओरसे पहले ही हुआ रहता है। इच्छा
करनेसे तो आवश्यक वस्तुओंकी प्राप्तिमें बाधा ही आती
है। अगर मनुष्य किसी वस्तुको अपने लिये अत्यन्त आवश्यक
समझकर 'वह वस्तु कैसे मिले? कहाँ मिले? कब
मिले?'-ऐसी प्रबल इच्छाको अपने अन्तःकरणमें पकड़े
रहता है, तो उसकी उस इच्छाका विस्तार नहीं हो पाता।