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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 850

श्लोक १८-१९ ] * साधक-संजीवनी * ८४९

सम्बन्ध-अब आगेके दो श्लोकोंमें सिद्ध भक्तके दस लक्षणोंवाला पाँचवाँ और अन्तिम प्रकरण कहते हैं।

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।

शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८ ॥

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।

अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥

शत्रौ = (जो) शत्रु प्रतिकूलता-) में (शरीरका निर्वाह

च = और समः = सम है होने-न-होनेमें)

मित्रे = मित्रमें च = एवं सन्तुष्टः = सन्तुष्ट

तथा = तथा सङ्गविवर्जितः = आसक्तिरहित अनिकेतः = रहनेके स्थान तथा

मानापमानयोः = मान-अपमानमें है (और) शरीरमें ममता-

समः = सम है (और) तुल्यनिन्दा- आसक्तिसे रहित

शीतोष्ण- स्तुतिः = जो निन्दा-स्तुतिको (और)

सुखदुःखेषु = शीत-उष्ण (शरीर- समान समझने- स्थिरमतिः = स्थिर बुद्धिवाला है,

की अनुकूलता- वाला, भक्तिमान् = (वह) भक्तिमान्

प्रतिकूलता) तथा मौनी = मननशील, नरः = मनुष्य

सुख-दुःख-(मन- येन = जिस मे = मुझे

बुद्धिकी अनुकूलता- केनचित् = किसी प्रकारसे भी प्रियः = प्रिय है।

व्याख्या—'समः शत्रौ च मित्रे च'—यहाँ भगवान्‌ने

भक्तमें व्यक्तियोंके प्रति होनेवाली समताका वर्णन किया है।

सर्वत्र भगवद्बुद्धि होने तथा राग-द्वेषसे रहित होनेके कारण

सिद्ध भक्तका किसीके भी प्रति शत्रु-मित्रका भाव नहीं

रहता। लोग ही उसके व्यवहारमें अपने स्वभावके अनुसार

अनुकूलता या प्रतिकूलताको देखकर उसमें मित्रता या

शत्रुताका आरोप कर लेते हैं। साधारण लोगोंका तो कहना

ही क्या है, सावधान रहनेवाले साधकोंका भी उस सिद्ध

भक्तके प्रति मित्रता और शत्रुताका भाव हो सकता है।

परंतु भक्त अपने-आपमें सदैव पूर्णतया सम रहता है।

उसके हृदयमें कभी किसीके प्रति शत्रु-मित्रका भाव उत्पन्न

नहीं होता।

मान लिया जाय कि भक्तके प्रति शत्रुता और

मित्रताका भाव रखनेवाले दो व्यक्तियोंमें धनके बँटवारेसे

सम्बन्धित कोई विवाद हो जाय और उसका निर्णय

करानेके लिये वे भक्तके पास जायँ, तो भक्त धनका

बँटवारा करते समय शत्रु-भाववाले व्यक्तिको कुछ अधिक

और मित्र-भाववाले व्यक्तिको कुछ कम धन देगा। यद्यपि

भक्तके इस निर्णय- (व्यवहार-) में विषमता दीखती है,

तथापि शत्रु-भाववाले व्यक्तिको इस निर्णयमें समता दिखायी

देगी कि इसने पक्षपातरहित बँटवारा किया है। अतः

भक्तके इस निर्णयमें विषमता (पक्षपात) दीखनेपर भी

वास्तवमें यह (समताको उत्पन्न करनेवाला होनेसे) समता

ही कहलायेगी।

उपर्युक्त पदोंसे यह भी सिद्ध होता है कि सिद्ध भक्तके

साथ भी लोग (अपने भावके अनुसार) शत्रुता-मित्रताका

व्यवहार करते हैं और उसके व्यवहारसे अपनेको उसका

शत्रु-मित्र मान लेते हैं। इसीलिये उसे यहाँ शत्रु-मित्रसे

रहित न कहकर 'शत्रु-मित्रमें सम' कहा गया है।

'तथा मानापमानयोः'—मान-अपमान परकृत क्रिया

है, जो शरीरके प्रति होती है। भक्तकी अपने कहलानेवाले

शरीरमें न तो अहंता होती है, न ममता। इसलिये शरीरका

मान-अपमान होनेपर भी भक्तके अन्तःकरणमें कोई विकार

(हर्ष-शोक) पैदा नहीं होता। वह नित्य-निरन्तर समतामें

स्थित रहता है।

'शीतोष्णसुखदुःखेषु समः'—इन पदोंमें दो स्थानों-

पर सिद्ध भक्तकी समता बतायी गयी है—

(१) शीत-उष्णमें समता अर्थात् इन्द्रियोंका अपने-

अपने विषयोंसे संयोग होनेपर अन्तःकरणमें कोई विकार

न होना।