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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 858, कुल 1299 में से

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पृष्ठ 858

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

८५७

दूसरी सत्ताकी मान्यता होते हुए भी साधक भगवान्‌के परायण रहता है और भगवान्‌के सिवाय दूसरा कोई उसका प्रेमास्पद नहीं होता, इसलिये वह भगवान्‌को अत्यन्त प्यारा होता है। जबतक उसको 'सब कुछ भगवान्‌ ही हैं'—इसका अनुभव नहीं होता, तबतक भगवान्‌ उसके ऋणी रहते हैं!

श्रीमद्भागवतमें भगवान्‌ कहते हैं—

यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते। तावदेवमुपासीत वाङ्मनःकायवृत्तिभिः ॥

(११ । २९ । १७)

'जबतक सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरा भाव अर्थात् 'सब कुछ परमात्मा ही हैं'—ऐसा वास्तविक भाव न होने लगे, तबतक इस प्रकार मन, वाणी और शरीरकी सभी वृत्तियों-(बर्ताव-) से मेरी उपासना करता रहे।'

सर्व ब्रह्मात्मकं तस्य विद्याऽऽत्ममनीषया। परिश्यनुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशयः ॥

(११ । २९ । १८)

'पूर्वोक्त साधन करनेवाले भक्तका 'सब कुछ परमात्मास्वरूप ही है'—ऐसा निश्चय हो जाता है। फिर वह इस अध्यात्मविद्या (ब्रह्मविद्या) द्वारा सब प्रकारसे संशयरहित होकर सब जगह परमात्माको भलीभाँति देखता हुआ उपराम हो जाय अर्थात् 'सब कुछ परमात्मा ही हैं'—यह चिन्तन भी न रहे, प्रत्युत साक्षात् परमात्मा ही दीखने लगें।'

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवान्‌नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीताउपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'भक्तियोग' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

इस (बारहवें) अध्यायमें अनेक प्रकारके साधनों-सहित भगवद्भक्तिका वर्णन करके भक्तोंके लक्षण बताये गये हैं और इस अध्यायका उपक्रम तथा उपसंहार भी भगवद्भक्तिमें ही हुआ है। केवल तीसरे, चौथे और पाँचवें—तीन श्लोकोंमें ज्ञानके साधनका वर्णन है, पर वह भी भक्ति और ज्ञानकी परस्पर तुलना करके भक्तिको श्रेष्ठ बताने लिये ही है। इसीलिये इस अध्यायका नाम 'भक्तियोग' रखा गया है।

बारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

बारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथ द्वादशोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके चार, श्लोकोंके दो सौ चौवालीस और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग दो सौ चौंसठ है।

(२) 'अथ द्वादशोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके तेरह, श्लोकोंके छ: सौ चालीस और पुष्पिकाके पैंतालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग सात सौ पाँच है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें दो उवाच हैं—'अर्जुन उवाच' और 'श्रीभगवानुवाच'।

बारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

बारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे—नवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; उन्नीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; और बीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' तथा तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'संकीर्ण-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष सत्रह श्लोक ठीक 'पथ्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।