श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 860, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
अवतरणिका—
बारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने पूछा कि आप (सगुण-साकार-)की उपासना करनेवाले और अव्यक्त अक्षर-(निर्गुण-निराकार) की उपासना करनेवाले—इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ हैं? उत्तरमें भगवान्ने अपनी उपासना करनेवालोंको श्रेष्ठ बताया और आगे कहा कि अव्यक्त अक्षरकी उपासना करनेवाले भी मेरेको ही प्राप्त होते हैं; परन्तु देहाभिमान रहनेके कारण उनको उपासनामें कठिनाता अधिक होती है। ऐसा कहकर भगवान्ने सगुण-साकारकी उपासनाका विस्तारसे वर्णन किया। अब अव्यक्त अक्षरकी उपासनाका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये और उसमें देहाभिमानरूप मुख्य बाधाको दूर करनेके लिये भगवान् तरहवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं। सबसे पहले भगवान् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विवेकका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| कौन्तेय | = हे कुन्तीपुत्र | क्षेत्रम् | = 'क्षेत्र'— | वेत्ति | = जानता है, |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन! | इति | = इस | तम् | = उसको | |
| इदम् | = 'यह'-रूपसे | अभिधीयते | = नामसे कहते हैं | तद्विदः | = ज्ञानीलोग |
| कहे | (और) | क्षेत्रज्ञः | = 'क्षेत्रज्ञ'— | ||
| जानेवाले | एतत् | = इस क्षेत्रको | इति | = इस नामसे | |
| शरीरम् | = शरीरको | यः | = जो | प्राहुः | = कहते हैं। |
व्याख्या— ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते’—मनुष्य ‘यह पशु है, यह पक्षी है, यह वृक्ष है’ आदि-आदि भौतिक चीजोंको इदंतासे अर्थात् ‘यह’-रूपसे कहता है और इस शरीरको कभी ‘मैं’-रूपसे तथा कभी ‘मेरा’-रूपसे कहता है। परन्तु वास्तवमें अपना कहलानेवाला शरीर भी इदंतासे कहलानेवाला ही है। चाहे स्थूलशरीर हो, चाहे सूक्ष्मशरीर हो और चाहे कारणशरीर हो, पर वे हैं सभी इदंतासे कहलानेवाले ही।
जो पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ है अर्थात् जो माता-पिताके रज-वीर्यसे पैदा होता है, उसको स्थूलशरीर कहते हैं। इसका दूसरा नाम ‘अन्मयकोश’ भी है; क्योंकि यह अन्नेके विकारसे ही पैदा होता है और अन्नेसे ही जीवित रहता है। अतः यह अन्मय, अन्स्वरूप ही है। इन्द्रियाँका विषय होनेसे
यह शरीर ‘इदम्’ (‘यह’) कहा जाता है।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि—इन सत्रह तत्वोंसे बने हुएको सूक्ष्मशरीर कहते हैं। इन सत्रह तत्वोंमेंसे प्राणोंकी प्रधानताको लेकर यह सूक्ष्मशरीर ‘प्राणमयकोश’, मनकी प्रधानताको लेकर यह ‘मनोमयकोश’ और बुद्धिकी प्रधानताको लेकर यह ‘विज्ञानमयकोश’ कहलाता है। ऐसा यह सूक्ष्मशरीर भी अन्तःकरणका विषय होनेसे ‘इदम्’ कहा जाता है।
अज्ञानको कारणशरीर कहते हैं। मनुष्यको बुद्धितकका तो ज्ञान होता है, पर बुद्धिसे आगेका ज्ञान नहीं होता, इसलिये इसे अज्ञान कहते हैं। यह अज्ञान सम्पूर्ण शरीरोंका कारण होनेसे कारणशरीर कहलाता है—‘अज्ञानमेवास्त्य हि मूलकारणम्’ (अध्यात्म०, उत्तर० ५।९)। इस कारण-शरीरको स्वभाव, आदत और प्रकृति भी कह देते हैं और