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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 865

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

परिशिष्ट भाव— क्षेत्रज्ञ (जीव) और ब्रह्म एक ही हैं। एक क्षेत्रके सम्बन्धसे वह 'क्षेत्रज्ञ' है और सम्पूर्ण क्षेत्रोंके सम्बन्धसे रहित होनेपर वह 'ब्रह्म' है।

'इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रम्' पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि शरीर (क्षेत्र)-की अनन्त ब्रह्माण्डों (सृष्टिमात्र)-के साथ एकता है और 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्वि' पदोंसे यह सिद्ध हुआ कि स्वयं (क्षेत्रज्ञ)-की अनन्त-अपर-असीम परमात्माके साथ एकता है। अतः हमारेसे दूर-से-दूर कोई वस्तु है तो वह शरीर है और नजदीक-से-नजदीक कोई वस्तु है तो वह परमात्मा है। तात्पर्य है कि शरीर और संसार एक हैं तथा स्वयं और परमात्मा एक हैं (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। यही ज्ञान है।

ब्रह्मके लिये 'माम्' कहनेका तात्पर्य है कि ब्रह्म और ईश्वर दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं— 'मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' (गीता ९।४) 'यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है'। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें जो निलिप्तरूपसे सर्वत्र परिपूर्ण चेतन है, वह ब्रह्म है और जो अनन्त ब्रह्माण्डोंका मालिक है, वह ईश्वर है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके ज्ञानको ही अपने मतमें ज्ञान बताकर अब भगवान् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको सुननेकी आज्ञा देते हैं।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥

तत्= वह= और= और
क्षेत्रम्= क्षेत्रयतः= जिससेयत्प्रभावः= जिस प्रभाववाला
यत्= जो हैयत्= जोहै,
= और(पैदा हुआ है)तत्= वह सब
यादृक्= जैसा है= तथासमासेन= संक्षेपमें
= तथासः= वह क्षेत्रज्ञ (भी)मे= मुझसे
यद्विकारि= जिन विकारोंवाला हैयः= जो हैशृणु= सुन।

व्याख्या— 'तत्क्षेत्रम्'—'तत्' शब्द दोका वाचक होता है—पहले कहे हुए विषयका और दूरीका। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें जिसको 'इदम्' पदसे कहा गया है, उसीको यहाँ 'तत्' पदसे कहा है। क्षेत्र सब देशमें नहीं है, सब कालमें नहीं है और अभी भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है—यह क्षेत्रकी (स्वयंसे) दूरी है।

'यच्च' —उस क्षेत्रका जो स्वरूप है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें हुआ है।

'यादृक् च' —उस क्षेत्रका जैसा स्वभाव है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके छब्बीसवें-सत्ताईसवें श्लोकोंमें उसे उत्पन्न और नष्ट होनेवाला बताकर किया गया है।

'यद्विकारि' —यद्यपि प्रकृतिका कार्य होनेसे इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें आये तेईस तत्त्वोंको भी विकार कहा गया है, तथापि यहाँ उपर्युक्त पदसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके माने हुए सम्बन्धके कारण क्षेत्रमें उत्पन्न होनेवाले इच्छा-द्वेषादि

विकारोंको ही विकार कहा गया है, जिनका वर्णन छठे श्लोकमें हुआ है।

'यतश्च यत्' —यह क्षेत्र जिससे पैदा होता है अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सात विकार और तीन गुण, जिनका वर्णन इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें हुआ है।

'स च' —पहले श्लोकके उत्तरार्धमें जिस क्षेत्रज्ञका वर्णन हुआ है, उसी क्षेत्रज्ञका वाचक यहाँ 'सः' पद है और उसीके विषयमें यहाँ सुननेके लिये कहा जा रहा है।

'यः' —इस क्षेत्रज्ञका जो स्वरूप है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके बीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें और बाईसवें श्लोकमें किया गया है।

'यत्प्रभावश्च' —वह क्षेत्रज्ञ जिस प्रभाववाला है; जिसका वर्णन इसी अध्यायके इकतीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक किया गया है।

'तत्समासेन मे शृणु' —यहाँ 'तत्' पदके अन्तर्गत