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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 895

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १३ ]

पर इसके साथ तादात्म्य करके स्वयं बुद्धिका मालिक बन जाता है अर्थात् कर्ता और भोक्ता बन जाता है—‘पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुगुणान् ’ (गीता १३।२१)। परन्तु जब तत्त्वका बोध हो जाता है, तब स्वयं न कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ’ (गीता १३।३१)। फिर कर्तृत्व-भोक्तृत्वरहित पुरुषके शरीरद्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं, वे सब क्रियाएँ अहंवृत्तिसे ही होती हैं। इसी अहंवृत्तिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको गीतामें कई तरहसे बताया गया है; जैसे—प्रकृतिके द्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं। (तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक); प्रकृतिके गुणोंद्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं (तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक); गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (तीसरे अध्यायका अठ्ठाईसवाँ श्लोक); गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है (चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); इन्द्रियाँ ही अपने-अपने विषयोंमें बरत रही हैं (पाँचवें अध्यायका नवाँ श्लोक) आदि। तात्पर्य है कि बहिःकरण और अन्तःकरणके द्वारा जो क्रियाएँ होती हैं, वे सब प्रकृतिसे ही होती हैं।

‘पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते’ —अनुकूल परिस्थितिके आनेपर सुखी (राजी) होना—यह सुखका भोग है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेपर दुःखी (नाराज) होना—यह दुःखका भोग है। यह सुख-दुःखका भोग पुरुष-(चेतन)-में ही होता है—प्रकृति-(जड-)-में नहीं; क्योंकि जड प्रकृतिमें सुखी-दुःखी होनेकी सामर्थ्य नहीं है। अतः सुख-दुःखके भोकापनमें पुरुष हेतु कहा गया है। अगर पुरुष अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंसे मिलकर राजी-नाराज न हो तो वह सुख-दुःखका भोक्ता नहीं बन सकता।

सातवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपना (जड) और परा (चेतन) नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया है। ये दोनों प्रकृतियाँ भगवान्के स्वभाव हैं, इसलिये ये दोनों स्वतः ही भगवान्की ओर जा रही हैं। परन्तु परा प्रकृति (चेतन), जो परमात्माका अंश ही है और जिसकी स्वाभाविक रूचि परमात्माकी ओर जानेकी ही है, तात्कालिक सुखभोगमें आकर्षित होकर

अपरा प्रकृति-(जड-)-के साथ तादात्म्य कर लेता है। इतना ही नहीं, प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके वह ‘प्रकृतिस्थ पुरुष’के रूपमें अपनी एक स्वतन्त्र सत्ताका निर्माण कर लेता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), जिसको ‘अहम्’ कहते हैं। इस ‘अहम्’ में जड और चेतन दोनों हैं। सुख-दुःखरूप जो विकार होता है, वह जड-अंशमें ही होता है, पर जडसे तादात्म्य होनेके कारण उसका परिणाम ज्ञाता चेतनपर होता है अर्थात् जडके सम्बन्धसे सुख-दुःखरूप विकारको चेतन अपनेमें मान लेता है कि ‘मैं सुखी हूँ’, ‘मैं दुःखी हूँ’। जैसे, घाटा लगता है दूकानमें, पर दूकानदार कहता है कि मुझे घाटा लग गया। ज्वर शरीरमें आता है, पर मान लेता है कि मेरेमें ज्वर आ गया। स्वयंमें ज्वर नहीं आता*, यदि आता तो कभी मिटता नहीं।

सुख-दुःखका परिणाम चेतनपर होता है, तभी वह सुख-दुःखसे मुक्ति चाहता है। अगर वह सुखी-दुःखी न हो, तो उसमें मुक्तिकी इच्छा हो ही नहीं सकती। मुक्तिकी इच्छा जडके सम्बन्धसे ही होती है; क्योंकि जडको स्वीकार करनेसे ही बन्धन हुआ है। जो अपनेको सुखी-दुःखी मानता है, वही सुख-दुःखरूप विकारसे अपनी मुक्ति चाहता है और उसीकी मुक्ति होती है। तात्पर्य है कि तादात्म्यमें मुक्ति-(कल्याण-)-की इच्छामें चेतनकी मुख्यता और भोगोंकी इच्छामें जडकी मुख्यता होती है, इसलिये अन्तमें कल्याणका भागी चेतन ही होता है, जड नहीं।

विकृतिमात्र जडमें ही होती है, चेतनमें नहीं। अतः वास्तवमें सुखी-दुःखी ‘होना’ चेतनका धर्म नहीं है, प्रत्युत जडके संगसे अपनेको सुखी-दुःखी ‘मानना’ ज्ञाता चेतनका स्वभाव है। तात्पर्य है कि चेतन सुखी-दुःखी होता नहीं, प्रत्युत (सुखाकार-दुःखाकार वृत्तिसे मिलकर) अपनेको सुखी-दुःखी मान लेता है। चेतनमें एक-दूसरेसे विरुद्ध सुख-दुःखरूप दो भाव हो ही कैसे सकते हैं? दो रूप परिवर्तनशील प्रकृतिमें ही हो सकते हैं। जो परिवर्तनशील नहीं है, उसके दो रूप नहीं हो सकते। तात्पर्य यह है कि सब विकार परिवर्तनशीलमें ही हो सकते हैं। चेतन स्वयं ज्यों-का-त्यों रहते हुए भी परिवर्तनशील प्रकृतिके संगसे उसके विकारोंको अपनेमें आरोपित करता रहता है। यह

  • आत्मानं चेद विजानीयादयमसीति पुरुषः। किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुष्यंज्वरेत्॥

(बृहदारण्यक ४।४।१२)

‘यदि पुरुष आत्माको ‘मैं यही हूँ’ इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय, तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके ज्वर-(ताप-)-से अनुत्पन्न हो?’