श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १३ ]
‘न करोति न लिप्यते’—यह साधनजन्य नहीं है, प्रत्युत स्वतः-स्वाभाविक है। तात्पर्य है कि स्वरूपमें लेशमात्र भी कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है—यह स्वतःसिद्ध बात है। इसमें कोई पुरुषार्थ नहीं है अर्थात् इसके लिये कुछ करना नहीं है। तात्पर्य है कि कर्तृत्व-भोक्तृत्वको मिटाना नहीं है, प्रत्युत इनको अपनेमें स्वीकार नहीं करना है, इनके अभावका अनुभव करना है; क्योंकि वास्तवमें ये अपनेमें हैं ही नहीं! इसलिये साधकको अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्वका अनुभव करना चाहिये। अपनेमें निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व (निष्कामता-निर्ममता)-का अनुभव होना ही जीवन्मुक्त है। इसीको गीताने स्मृति प्राप्त होना कहा है—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा ’ (१८।७३)
अगर स्वरूप कर्ता और भोक्ता नहीं है तो फिर कर्ता और भोक्ता कौन है? यह विचार किया जाता है। पहले यह विचार करें कि कर्ता कौन है? शरीर कर्ता नहीं है; क्योंकि यह प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार—ये चार करण हैं, जिनको ‘अन्तःकरण’ कहते हैं। यह अन्तःकरण भी कर्ता नहीं है; क्योंकि करण कर्ताके अधीन होता है। परन्तु कर्ता स्वतन्त्र होता है—‘स्वतन्त्रः कर्ता ’ (पाणि० अ० १।४।५४)। करण तो क्रियाकी सिद्धिमें अत्यन्त सहायक होता है—‘साधकतमं करणम् ’ (पाणि० अ० १।४।४२), इसलिये करणके बिना किसी क्रियाकी सिद्धि होती ही नहीं। जैसे, कलम स्वतन्त्रतासे नहीं लिखती, प्रत्युत वह तो लिखनेका एक साधन (करण) है, जो लेखक (कर्ता)-के अधीन होता है। अतः करण कर्ता नहीं होता और कर्ता करण नहीं होता। दूसरी बात, यदि करणमें कर्तापन है तो फिर सुखी-दुःखी स्वयं क्यों होता है? यदि करण सुखी-दुःखी होता है तो हमें क्या नुकसान है? सत्-स्वरूप भी कर्ता नहीं है; क्योंकि मैंपन तो प्रकृतिका कार्य है, वह प्रकृतिसे अतीतमें कैसे सम्भव है? यदि स्वरूपमें कर्तापन होता तो वह कभी मिटता नहीं; क्योंकि स्वरूप अविनाशी है। इसलिये भगवान्ने यहाँ स्वरूपमें कर्तापनका निषेध किया है—‘न करोति ’। आगे अठारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने कहा है कि जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मीत ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है (गीता—अठारहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। वास्तवमें जो भोक्ता (सुखी-दुःखी) होता है, वही कर्ता होता है।
अब यह विचार करें कि भोक्ता कौन है? भोक्ता न सत् है, न असत् है। सत् भोक्ता नहीं हो सकता; क्योंकि सत्में कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः ’, जबकि भोक्तापनका अभाव होता है—‘न लिप्यते ’। असत् भी भोक्ता नहीं हो सकता; क्योंकि असत्की सत्ता ही नहीं है—‘नासतो विद्यते भावः ’। असत्में चेतनता भी नहीं है। अतः उसमें भोक्तापनकी कल्पना ही नहीं हो सकती। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तापन और भोक्तापन न तो सत्में हैं और न असत्में ही हैं। सत्-असत्के संयोगमें भी कर्तापन और भोक्तापन नहीं हैं; क्योंकि जैसे दिन और रातका संयोग असम्भव है, ऐसे ही सत् और असत्का संयोग भी असम्भव है। अतः कर्तापन-भोक्तापन केवल माने हुए हैं—‘कर्ताहमिति मन्यते ’ (३।२७)। जब साधक विवेकपूर्वक शरीरसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है अर्थात् मैं-मेरापनको मिटा देता है (जो कि वास्तवमें मैं नहीं), तब न कर्ता रहता है, न भोक्ता रहता है, प्रत्युत एक चिन्मय सत्ता रहती है। इस प्रकार अपनेमें कर्तापन और भोक्तापनके अभावका अनुभव होनेपर साधक मुक्त हो जाता है अर्थात् कर्ता-भोक्ता नहीं रहता, प्रत्युत शुद्ध स्वरूप (चिन्मय सत्ता) रह जाता है।
‘न करोति न लिप्यते ’ पदोंका विवेचन भगवान्ने आगे बत्तीसवें-तैंतीसवें श्लोकोंमें किया है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि वह पुरुष न करता है और न लिप्त होता है, तो अब प्रश्न होता है कि वह कैसे लिप्त नहीं होता और कैसे नहीं करता? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥
| यथा | = जैसे | न, उपलिप्यते = (कहीं भी) लिप्त | अवस्थितः | = परिपूर्ण |
|---|---|---|---|---|
| सर्वगतम् | = सब जगह व्याप्त | नहीं होता, | आत्मा | = आत्मा |
| आकाशम् | = आकाश | तथा | = ऐसे ही | देहे |
| सौक्ष्म्यात् | = अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे | सर्वत्र | = सब जगह | न, उपलिप्यते = लिप्त नहीं होता। |