समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिस समझ से विषय में... (खं-2-1)
५५
अभिप्राय रहना चाहिए। यह बगीचा नहीं है। यह फँसाव ही है। ऐसा भान रहेगा तो छूटा जा सकेगा। लेकिन यहाँ ऐसा भान नहीं रहता है न? फँसाव हो तो वहाँ कैसा रहता है? और बगीचे में घूम रहे हों, तब कैसा रहता है? बगीचे में तो यों उल्लास रहता है, जबकि फँसाव में तो कब इसमें से छूट जाऊँ, ऐसा रहता है न? इसलिए 'हमें' 'चंद्रेश' से कहना है कि 'चंद्रेश इसमें से कब छूटोगे! यह तो फँसाव है। इसमें पड़ने जैसा नहीं है।' लेकिन इसमें फँसाव जैसा नहीं लगता और वहाँ मुक्त भाव हो जाता है न? अब यदि पूरी समझ बदल दें, तो हल आएगा।
समझकर दखिल होना इसमें...
प्रश्नकर्ता : यह जो डिसीजन ले लिया है, लेकिन पिछला माल बहुत है। तो डिसीजन के आधार पर मैं इसमें से निकल पाऊँगा?
दादाश्री : डिसीजन सही होगा तो जरूर निकल पाओगे, निश्चय मुख्य चीज है। जिसने निश्चय को पकड़ा है, दुनिया में कोई उसका नाम नहीं देगा। तुझे क्यों शंका हो रही है? शंका हो रही है, वही अनिश्चय कहलाता है।
प्रश्नकर्ता : आपसे पूछकर पक्का कर रहा हूँ।
दादाश्री : नहीं, लेकिन शंका हो रही है, वही अनिश्चय है। कुछ भी नहीं होगा। दादा की छत्रछाया है, फिर क्या होनेवाला है? इसलिए शंका रखने जैसा नहीं है। यह ज्ञान है इसलिए ब्रह्मचर्य में रहा जा सकेगा, वर्ना मैं ही तुम्हें मना कर दूँ। मैं तो आज्ञा दे दूँ कि तुम्हें शादी करनी पड़ेगी। वह तो 'यह' ज्ञान है इसलिए तुम्हें अनुमति देता हूँ। क्योंकि इंसान को सुख का साधन चाहिए न? मरता हुआ इंसान किस सुख के सहारे जीएगा? यह ज्ञान ऐसा है कि आप इस ज्ञान से आत्मा के ध्यान में रहोगे तो तुरंत आनंद में आ जाओगे। या फिर अगर घंटे भर सभी के