भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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दृष्टि उखड़े, 'श्री विज्ञन' से (खं-2-२)

८९

मोहबाजार तो मार ही डाले इस काल में। यह तो स्त्रियों को देखने से ही रोग घुस जाता है न! क्या वह शादीशुदा नहीं है? शादीशुदा है फिर भी ऐसे! क्योंकि यह काल ही ऐसा है। यह श्री विज्ञन याद रहेगा या भूल जाओगे?

प्रश्नकर्ता : दृढ़ निश्चय होने के बावजूद किसी स्त्री की ओर बार-बार दृष्टि आकृष्ट होती है और श्री विज्ञन जानने के बावजूद 'जैसा है वैसा' क्यों नहीं दिखता?

दादाश्री : उसने श्री विज्ञन जाना नहीं है, श्री विज्ञन जान ले तो उसकी दृष्टि आकृष्ट ही नहीं होगी। श्री विज्ञन दिखे तो उसमें पड़ेगा ही नहीं। जबकि यह तो दृष्टि पड़े तो वापस देख लेता है।

प्रश्नकर्ता : यह जो श्री विज्ञन नहीं दिखता है, क्या वह मोह के कारण है?

दादाश्री : जानता ही नहीं है। श्री विज्ञन क्या है, वह जानता ही नहीं है। मोह के कारण भान में ही नहीं आता और मोह यानी अभानता।

प्रश्नकर्ता : तो फिर अब श्री विज्ञन दिखने का उपाय क्या है?

दादाश्री : वह दिखेगा नहीं। उसका उपाय ही क्या करना? वह जिसे दिखता है, वे इंसान अलग ही तरह के होते हैं। गजब के इंसान होते हैं।

इस काल में इंसान को इतना वैराग्य नहीं रह पाता! अतः यह श्री विज्ञन बहुत ऊँची चीज़ है, उससे फिर वैराग्य रहता है। हमने छोटी उम्र से ही ऐसा प्रयोग किया था। खोज की कि सबसे बड़ा रोग यही है। फिर इस जागृति से प्रयोग किया, बाद में तो हमें सहज हो गया। हमें यों ही सबकुछ आसानी से दिखता है।